
रविवार का दिन था, उसके फुदकने-खेलने के लिए...। वो यूँ ही घर में उपर से नीचे और नीचे से उपर के चक्कर लगा रही थी। पता नहीं क्यों, उसके बहुत दोस्त नहीं थे। पिता सब्जी लेकर अभी-अभी लौटे थे और वो उस जादू के थैले में से अपने काम की चीजें टटोल रही थी। अरे वाह...! आज तो बहुत कुछ था उस थैले में... सर्दियों के दिन थे – गाजर, मटर और हाँ... बेर भी...। उसने अपनी फ्रॉक को झोलीनुमा बनाया और उसमें अपनी-अपनी छोटी-छोटी मुट्ठी में भरकर मटर और बेर डालने लगी... जब लगा कि अभी गाजर रखने की जगह बचानी है तो दो-तीन बड़ी-बड़ी गाजर उठाकर अपनी झोली में रख ली और गली के मुहाने पर जहाँ तीन-चार रास्ते गुजरते हैं एक मैदान सा बना है, वहाँ पहुँच गई।
ये वही जगह है, जहाँ आसपास के गलियों में रहने वाले सारे बच्चे शाम को खेलने आते हैं। वही एक पत्थर पर वो बैठ गई थी। मैदान सुनसान था वक्त हुआ होगा कोई 10-11 बजे का (सुबह)। उसने इत्मीनान से अपने दोनों पैरों को फैलाकर अपने फ्रॉक की झोली को सहेजकर व्यवस्थित कर लिया। गाजर खाना शुरू किया, फिर मटर... तभी उसके सामने एक 25-27 साल का लड़का आकर खड़ा हो गया। उसने सामने वाली गली की तरफ इशारा कर कहा – उधर गली में 10 पैसे पड़े हैं, चल लेकर आते हैं...। उस 10 साल की बच्ची ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा...। उसने देखा कि उस लड़के ने नीली पेंट पर बहुत सारे खूबसूरत और चटक रंग का कोट पहना हुआ था। बच्ची को उसके कोट के रंग बहुत पसंद आए...।
उस लड़के ने फिर से अपनी बात दोहराई। बच्ची ने कहा – नहीं, मुझे नहीं चाहिए और उसने अपनी झोली में से बेर उठाकर उसकी टोपी काटी। वो लड़का थोड़ी देर असमंजस में खड़ा रहा। फिर उसने कहा – अच्छा, ये तेरे इयररिंग मैं ले लूँ।
बच्ची ने बेर की गुठली चुसते हुए हाँ में सिर हिला दिया। उसने बच्ची के कानों की बालियाँ उतारी और लेकर चला गया। वो वहाँ वैसे ही अकेले बैठी रही। गाजर और मटर पहले ही खत्म हो चुकी थी, सारे बेर खत्म किए और खड़े होकर अपनी फ्रॉक झाड़ी...। थोड़ी देर यूँ ही बैठी रही और फिर घर लौट आई। माँ ने खाने के लिए कहा तो वो अपनी छोटी थाली लेकर बैठ गई। माँ थाली में रोटी रख रही थी तो उसने जोर-जोर से सिर हिलाकर इंकार किया, पता नहीं कैसे माँ की नजर उसके कानों पर गई। तेरी बालियाँ कहाँ गई? – माँ ने जोर देकर पूछा।
उसने बहुत निस्संगता से दाल-चावल का कोर बनाते हुए बताया – वो एक अंकल ले गए।
अब माँ घबराई... – कौन अंकल? औऱ तूने मना नहीं किया...? – माँ ने झल्ला कर पूछा।
वो अंकल जो गली वहाँ मैदान में मिले थे...। उसने उसी निस्संगता से माँ से कहा और सोचने लगी कि माँ इतना क्यों झल्ला रही है? अबकी माँ खड़ी हो गई और उसका हाथ पकड़कर घर के आँगन में ले आई। पिता, दादा-दादी सबके सामने उन्होंने सारी बात बताई। और फिर सारे लोग उसे उस जगह ले गए। उससे पूछा – तूने देखा वो अंकल किस तरफ गए हैं?
उसने भी हाथ के इशारे से बाँई और जाती गली बता दी... लेकिन सारे लोगों की घबराहट का कारण उसे समझ नहीं आ रहा था। दादी ने पूछा – कित्ती देर से पहले की बात है?
उसने बहुत लापरवाही से कंधे उचका कर कहा – बहुत देर हो गई।
इतना सुनते ही सारे लोग निराश हो चुके थे, अब तक तो पता नहीं कहाँ का कहाँ पहुँच गया होगा। हुआ क्या था? अब ये सवाल उठा। उस बच्ची ने सारी घटना सिलसिलेवार सुना दी। अरे... ! 10 पैसे के लालच में इसने अपने इयररिंग गवाँ दिए...। – माँ ने कहा तो उसने तुरंत प्रतिवाद किया – नहीं पैसे के लालच में नहीं...। लेकिन उसकी बात अनसुनी कर दी गई...।
फिर कई तरह की बातें हुई – अच्छा ही हुआ जो इसने इंकार नहीं किया, क्या पता गला ही दबा देता या फिर उठाकर ही ले जाता। धीरे-धीरे जो हुआ उसे होनी मानकर और उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाया ये सोचकर घरवालों ने सब्र रख लिया। बहुत सालों तक उसने खुद से भी यही सवाल किया कि आखिर जब उस लड़के ने उससे इयररिंग माँगे थे तो उसने इंकार क्यों नहीं किया... लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला... आज भी उसके पास इस बात का जवाब नहीं था। बाद में कई बार ये घटना दोहराई गई और हर बार वो ये सुनकर प्रतिवाद करती कि – ‘10 पैसे के लालच में इसने अपने इयररिंग गवाँ दिए।’ बाद के दिनों ने जब कभी इस घटना को दोहराया जाता और वो वाक्य बोला जाता तो उसे लगता कि क्यों नहीं उसने उस गली में जाकर देखा कम-से-कम ये ‘लालच’ ही कर लेती तो उसे इतना बुरा तो नहीं लगता। फिर घरवालों ने उसे सोना पहनाना बंद कर दिया, बड़े होने पर उसने खुद ही सोने से दूरी बना ली। बड़े हो जाने के बाद इस घटना की दो चीजें उसे शिद्दत से याद रही – 1. उस लड़के का कोट और 2. इस बात पर लगातार का प्रतिवाद कि उसने अपने इयररिंग 10 पैसे के लालच में नहीं दिए थे। हाँ, क्यों दिए थे, ये भी उसे पता नहीं।
इस घटना के बाद सोना (gold) उसके जीवन की ग्रंथि बन गया। खरीदने का मन होता और खरीदती तो है, लेकिन पहनने की न इच्छा होती है और न ही हिम्मत। हाँ लेकिन इससे उसने अपने बारे में दो चीजें जानी एक कि कई बार उसके कुछ करने या न करने के पीछे कोई कारण नहीं होता है और दूसरा वो कभी भी किसी चीज के लिए इंकार नहीं कर पाती है। औऱ ये आज भी उसके साथ है... पता नहीं ये अच्छा है या बुरा...!
1 comments:
तुम्हे हर COMPLEX से निकालूगा...
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