12/02/2012

पाँच गज़लों का फासला


दिन बड़ा ही अजीब-सा गुजरा था। बेवजह ही बहस हो गई, वो भी महिलाओं की हमारे समाज में दशा और दिशा पर...। यूँ तो महिलाओं को और महिलाओं के दुख कम नहीं है, लेकिन हम पढ़ी-लिखी महिलाओं को अपने दुख का अहसास बड़ी शिद्दत से होता है। हालाँकि ये भी जरूरी नहीं है कि हर पढ़ी-लिखी महिला को हो... सुशील होने का तमगा शायद हर चीज से बड़ा होता होगा... तभी तो... या फिर ग्रूमिंग ही इस तरह से होती है कि उनकी जिंदगी से जुड़ी छोटी-छोटी बातें बहुत महत्वहीन होती है, या फिर उनका ‘स्व’ दुनिया की बाकी सारी छोटी-बड़ी बातों की तुलना में बहुत महत्वहीन होता हो.... तो बात तो महज इतनी सी थी कि महिलाओं को ये तय करना चाहिए कि उनके जीवन की प्राथमिकताएँ क्या हो...? परिवार या फिर वो खुद...। गोया कि उनका होना ही उनके पारिवारक जीवन की सबसे बड़ी बाधा हो.... :-( । नहीं, बहस ऐसे नहीं शुरू हुई थी, लेकिन खत्म इसी नोट पर हुई। इसके बीच इस बात का अहसास भी कि आपका होना समाज के लिए कितना ही अहम क्यों न हो.... हमारे लिए नहीं है, हमारे साथ की शर्तें जैसी हैं, वैसी ही रहेंगी.... इसमें फेरबदल की सूत भर भी गुंजाइश नहीं है, आपको सूट नहीं करता है तो बेहतर है आप शादी ही न करो....। देर तक दिमाग झनझनाता रहा.... फिर दिमाग से इस बात को झटकने की कोशिश भी की, ये सोचकर कि जिस ‘बेचारी’ महिला के लिए मैं बहस कर रही हूँ, शायद उसे तो अपनी स्थिति से कोई शिकायत ही नहीं है और फिर वो बेचारी तो ये जानती तक नहीं है कि कोई एक कितनी शिद्दत से उनके लिए लड़ रहा है... तो फिर सारा उद्वेलन तो बेकार ही है ना...! लेकिन जो कुछ अस्तव्यस्त हुआ है उसे तो व्यवस्थित होने में समय लगेगा ना... इस बीच अपने भी ‘औरत’ होने की बेचारगी फिर उभर आई...। और साथ ही सार्त्र याद आ गए, जो कह गए कि – ‘प्यार में प्रिय पात्र को वस्तु बनाने का षडयंत्र रचा जाता है।‘ काम तो था, लेकिन उद्विग्नता ने एकाग्रता छिन ली थी और आज का काम कल पर छोड़कर घर की राह पकड़ ली थी। स्थिर करने के लिए म्यूजिक प्लेयर ऑन कर लिया था। दफ्तर से घर तक का फासला पाँच गजलों का है, यदि रास्ते के तीनों सिग्नल क्लियर हो तो... नहीं हो तो आधी गज़ल का फासला और बढ़ जाता है।
शुरुआत ही बहुत उदास-सी गज़ल कितनी राहत है दिल टूट जाने के बाद से हुई थी.... गाड़ी रिवर्स की फिर गियर बदला और आगे बढ़ा दी। शाम हो चली थी, बसंत के लिहाज से मौसम थोड़ा ज्यादा ठंडा था। बंद खिड़की से गाड़ी चलाने का अनुभव ठीक सनग्लास लगाने जैसा होता है, इसलिए बहुत मजबूरी के अतिरिक्त गाड़ी का ड्राइविंग सीट वाला शीशा खुला ही होता है। देखना जो आसान होता है। मन तो किया कि कहीं किसी सुनसान में गाड़ी खड़ी करके एक गहरी साँस ली जाए और चीखकर रो लिया जाए... लज़्ज़ते सजदा-ए-संगे दर क्या कहें/ होश ही कब रहा सर झुकाने के बाद... रूलाने के लिए काफी था, लेकिन हाय रे शहर की मजबूरियाँ...। लगा बड़ा मौजूं शेर है... ‘बिचारी’ औरतों के लिए.... । सर झुका लिया है तो अब होश में आने से बाज़ आ जाओ....।
चौराहे पर अगली लेन में जाने के लिए गाड़ी रूकी तो देखा तीन छोटे बच्चे गर्म कपड़े पहने एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए सड़क पार कर रहे हैं। लगा कि ये फोटो का विषय हो सकता है, मोबाइल के कैमरे को ऑन करने से पहले ही तीनों गाड़ी के पास से निकल गए और पीछे खड़ी गाड़ी का कर्कश हॉर्न चीख पड़ा.... अशआर मेरे यूँ तो जमाने के लिए हैं.... गज़ल शुरू हो चुकी थी....। कितनी अच्छी कंपोजिशन है, किसकी होगी और ये मुकेश ने ज्यादा गज़लें क्यों नहीं गाई.... कुछ और बेहतर मिलता सुनने के लिए.... पीछे छूट गया था दिन... अभी घर आगे था... फिलहाल तो सफर था। सोचो तो बड़ी चीज है तहजीब बदन की/ वरना तो बदन आग बुझाने के लिए हैं.... शेर कितना खूबसूरत है, लेकिन ये जांनिसार अख्तर के दौर का सच है... अब तो ये पुराना हो गया है। क्या वाकई कोई चीज कालजयी हो सकती है....? कल रात कागज़ के फूल एक बार फिर देखने की कोशिश करने के दौरान उठा सवाल फिर से टकराया... हर रचना का अपना समय होता है, समाज और समाज के मूल्य बदलते ही रचना की प्रासंगिकता भी बदल जाती है। याद आया सुबह आते हुए गाना चल रहा था – एक मुद्दत से तमन्ना थी तुम्हें छूने की... क्या ये आज का सच हो सकता है? जिस दौर में भौतिकता परम धर्म हो....!
सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं.... चल रही थी। इत्तफाक से दूसरे सिग्नल पर गाड़ी रोकनी पड़ी... चिढ़ तब आई, जब राइट साइड जाने वाली गाड़ी भी लेफ्ट साइड वाली लेन में खड़ी थी और सिग्नल चालू होते ही, उसकी हड़बड़ी अपनी लेन मे पहुँच जाने की थी, इस हड़बड़ी में वो तो निकल गया और सिग्नल फिर से ऑफ हो गया। गज़ल का आखिरी शेर चल रह था, देखिए मेरी पज़ीराई को अब आता है कौन/ लम्हा भर को वक्त की दहलीज पर आया हूँ मैं... कहाँ से आते हैं ये अहसास और ये अशआर... हताशा की एक लहर, उपर की तरफ चढ़ने लगी। और फिर गुलाम अली ने सरगम शुरू कर दी, दुखती रग में और दर्द उभर आया...। अबकी जैसे ही सिग्नल क्लियर हुआ, तुरंत गाड़ी आगे बढ़ा ली, हालाँकि लेफ्ट साइड से आने वाली सड़क से राइट जाने वाले वाहनों ने आधा रास्ता रोके रखा था, फिर भी हम तो निकल गए... लगा कि सारी दुनिया ही हड़बड़ी में है। वैसे भी अक्सर जब हमें जल्दी होती है तो लगता है कि सारी दुनिया ही आज जल्दी में हैं।
तब तक दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों/ पहले जो दर्द था, वही चारा है इन दिनों शुरू हो गई थी। चित्रा की आवाज चाहे जगजीत के साथ सूट नहीं करती हो, लेकिन उनकी गज़लों में भी दर्द तो उभरता ही है...। एकाएक ये तलब उठी कि ये गाड़ी मेरे कमरे में तब्दील हो जाए... ठंडा, अँधेरा-सा कमरा... नए-पुराने, याद आते और भूले हुए, मजाज़ी और हक़ीक़ी सारे दर्द-तकलीफें धुआँ-धुआँ होकर कमरे में बिखर जाए और ऐसे ही दम घुट जाए... इससे बेहतर मौत और क्या हो सकती है...? लेकिन अचानक मौत की याद क्यों आई है...। तीसरा और अंतिम सिग्नल... बस बंद हुआ ही जा रहा था कि हमने गाड़ी को रफ्तार दे डाली। बिना रूके अपनी राह हो लिए... हरिहरन शुरू हो चुके थे, तब तक... खुद को बेहतर है सराबों में भटकता देखूँ/ वरना वो प्यास है मर जाऊँ तो दरिया देखूँ। बस ऐसे ही मौत की याद आई थी। लगा कि सब कुछ एक दिन खत्म हो जाना है, प्रेम-घृणा, अच्छाई-बुराई, सफलता-असफलता, पाप-पुण्य, तेरा-मेरा, खुशी-दुख... रिश्ते-नाते और सारी भौतिकताएँ... एकाएक बड़ी राहत लगी। ठीक वैसे, जैसे एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा... लगा कि बस थोड़ा ही तो सहना है। हालाँकि बहुत बेवकूफाना है, लेकिन बहुत राहत देने वाला था ... एक दिन मैं इस सबसे आजाद हो जाऊँगी, जो आज मुझे तकलीफ दे रहा है... मुक्त... स्वच्छंद...। थोड़ा-सा जाम लगा था... तो जाहिर है कि छठी गज़ल शुरू होनी ही है। आशा का आलाप-सा खत्म हुआ और ... रूदाद-ए-मोहब्बत क्या कहिए/ कुछ याद रही कुछ भूल गए.... सारी उद्विग्नता, बेचैनी, हड़बड़ाहट, चिढ़ और गुस्सा सब कुछ झर गया-सा महसूस हुआ... लगा कि मरने के बाद शायद ऐसी ही मुक्ति का अहसास होगा... :-) हल्कापन हवा में भी महसूस हुआ... घर आ गया था।

15/12/2011

ज़हन और दिल पर क़ाबिज बाज़ार



रात को कितनी ही जल्दी क्यों न करें सोते-सोते 11.30 हो ही जाती है, लिहाजा सुबह जब नींद खुलती है तो सूरज खिड़कियों पर दस्तक दे रहा होता है। कुमारजी श्याम बजा बाँसुरिया सुना रहे होते हैं और चाय के प्याले के साथ सुबह के अखबार हुआ करते हैं, जिनमें ज्यादातर निगेटिव खबरें होती हैं...। लगभग हर सुबह का यही क्रम हुआ करता है। और हर दिन की शुरुआत अखबारों में छपी खबरें और विज्ञापन देखते-देखते मन के उद्विग्न हो जाने से होती है। यूँ लगता है कि या तो दुनियाभर में बस सब कुछ गलत ही गलत हो रहा है या फिर लगता है कि हमारे आसपास बस अभाव ही अभाव है... सुबह पूरी तरह नकारात्मकता से पगी हुई, तो दिनभर का आलम क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
अच्छा खासा बड़ा, खुला, रोशन और हवादार घर है, लेकिन अखबार में छपने वाले फ्लैट के लुभावने विज्ञापन अहसास दिलाते हैं कि साहब आपके पास तो वॉकिंग जोन, स्विमिंग पुल, कम्युनिटी हॉल वाली टाउनशिप में कोई फ्लैट नहीं है औऱ यदि वो नहीं है तो फिर आपके जीवन में एक बड़ा अभाव है। स्लिमिंग सेंटर के विज्ञापनों में एक हड्डी की मॉडल देखकर लगता है कि कमर और पेट पर कितनी चर्बी चढ़ रही है और ब्यूटी पार्लरों के विज्ञापन चेहरे पर उम्र के निशान दिखाने लगते हैं किसी कॉस्मेटिक सर्जन के विज्ञापन पढ़कर चेहरे की सामान्य बनावट में कमी नजर आने लगती है और कभी लगता है कि यदि डिंपल होता तो शायद चेहरा खूबसूरत होता... किसी सेल का विज्ञापन घरेलू सामानों के अभाव को तो कपड़ों के विज्ञापन नए डिजाइन, पैटर्न आदि के कपड़ों का अभाव अलग तरह के मन को उदास करता है, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, म्यूजिक सिस्टम, गाड़ी, एयरकंडीशनर, मोबाइल, लैपटॉप आदि यदि नए भी खऱीदे हो तो लगता है कि टेक्नॉलॉजी पुरानी हो गई है। तो चाहे घऱ के किसी भी कोने पर नजर डालों बस कमियाँ ही कमियाँ नजर आती हैं...। यूँ लगता है जैसे जीवन में कमियों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। कभी-कभी तो विज्ञापन ये भ्रम तक दे डालते हैं कि हो ना हो, हमें कोई-न-कोई बीमारी जरूर है। और ये सिलसिला रूकता ही नहीं, अखबार से शुरू होकर दफ्तर तक और दफ्तर से घर लौटकर रात को टीवी देखने तक ये बदस्तूर जारी रहता है।
घर से दफ्तर के बीच एक पूरा लंबा-चौड़ा बाजार पसरा हुआ है जिनमें सामानों की शक्ल में अलग-अलग आकार-प्रकार-रंग और पदार्थों के सपने टँगे होते हैं। आते-जाते ये सपने आँखों में उतर जाते और जिंदगी बस इन्हीं सपनों के इर्द-गिर्द चक्कर काटती सी लगती है। चौराहे के सिग्नल पर जब गाड़ी खड़ी थी, तभी पास में मायक्रा आकर रूकी... कितनी खूबसूरत गाड़ी है...! एक ठंडी आह निकली। शो-रूम पर हर दिन आते-जाते मेजेंटा रंग की ड्रेस पर ध्यान अटकता और हर दिन वो सपना जमा होता चला जाता है, बल्कि हर दिन कोई नया सपना साथ आता है। इनमें से कई पूरे किए, लेकिन ये फेहरिस्त कम होने का नाम ही नहीं लेती। इंटरनेट पर सर्फ करो तो पेंशन प्लान से लेकर गर्ल फॉर डेंटिंग तक और डायमंड ज्लैवरी से लेकर निवेश के विकल्पों को सुझाने वाले विज्ञापन... टीवी पर डिटर्जेंट से लेकर कोल्ड ड्रिंक तक और टीवी से लेकर बैंकिंग तक हर चीज का विज्ञापन शाम का समय खा जाता है... गोया बस हर जगह बाजार लगा हुआ है, खरीदो-बेचो... खरीदो-बेचो...।
कभी-कभी तो अपना आप भी बाजार का ही हिस्सा लगने लगता है। आखिर तो किसी भी वक्त खुद को बाजार से बाहर निकाल पाने की मोहलत ही नहीं मिलती है। हर वक्त कोई न कोई जरूरत की चीज याद आती है, कोई न कोई कमी, कोई न कोई सपना... क्या हम उपभोक्ता संस्कृति के प्रतिनिधि उदाहरण हैं? कभी-कभी तो लगता है कि सोते-जागते, हँसते-गाते, खाते-पढ़ते... पूरे समय दिमाग पर बाजार ही हावी रहता है। हो भी क्यों न...! यदि हम घर पर भी रहे तो अखबार, टीवी और इंटरनेट हर जगह बाजार पसरा मिलता है। लगता है कि एक पल को भी बाजार से मुक्ति नहीं है। देखते ही देखते बाजार न सिर्फ हमारे घरों तक आ पहुँचा है, बल्कि इसने हमारे उपर कब्जा कर लिया। अब बस खऱीदने और पुरानी चीजों को निकालने के अतिरिक्त और कोई विचार होता ही नहीं है, लगता है कि बस खऱीदो-बेचो, खऱीदो-बेचो यही है जीवन का ध्येय...।
दिसंबर मध्य में जब सर्दी ने अपनी आमद दर्ज करवा दी है। रात में हल्की धुँध-सी महसूस होती है और रजाई की गर्माहट शिराओं को और मेहंदी हसन की किसी अँधेरी खोह से आती आवाज में – मेरी आहों में असर है कि नहीं, देख तो लूँ... के तल दिमाग के तंतु जब शिथिल होने लगे, तब एक होशमंद विचार कौंधा कि बाजार असल में होश पर ही नहीं, बल्कि जहन और दिल तक पर काबिज़ हो गया है तभी एक सवाल उठा तो क्या बाजार से मुक्ति नहीं हैं?
जवाब मेरे पास नहीं है, क्या आपके पास है!

12/11/2011

अभिभूत करते लोग... पार्ट – 1


आजकल मुझे वो चीजें अभिभूत करती है, जो हकीकत में कुछ है ही नहीं। चमचमाती गाड़ियाँ, खूबसूरत कपड़े, महँगे गैजेट्स, चौंधियाती पार्टियाँ, खूबसूरत चेहरे, डुबाता संगीत या फिर गहरी किताबें अभिभूत नहीं करती। करते हैं जमीन से जुड़े लोग, स्वार्थ को दरकिनार कर दूसरों के लिए सुविधा जुटाते, हँसते हुए संघर्ष करते, अपने दुख-दर्द को बहुत करीने से सहेजते-सहते, सीखने के लिए खुले हुए, नया करने के लिए राह बनाते-निकालते लोग, छोटे-छोटे, नाजुक और मासूम-से जैस्चर्स और मीठे-मीठे रिश्ते... कहीं ठहर जाते हैं, भीतर और उस तरह उतरते चले जाते हैं जैसे बारिश की फुहारों का पानी उतरता रहता है जमीन के अंदर.... गहरे.... गहरे और गहरे...। अजीब है, लेकिन है... इन दिनों ऐसा ही कुछ अभिभूत करता है। पिछले कुछ दिनों से कुछ ऐसे ही लोग आसपास से गुजर रहे हैं और जीने का उनका तरीका, परिस्थितियों से लड़ने का साहस और जीवट मेरी यादों की किताब में दर्ज हो रहे हैं, उनके जीवन के गहरे अर्थ खुलते हैं और नया जीवन दर्शन भी मिलता है।
दीपक - वो हमारे घर पुताई करने के लिए आया था। रैक की किताबों को बहुत गौर से देख रहा था। यूँ ही पूछ लिया पढ़ते हो...। उसने बड़ी विनम्रता से नजरें झुकाकर गर्दन हाँ में हिला दी। हमने बड़े आश्चर्य से फिर से अपना सवाल दोहराया – पढ़ते हो?
इस बार उसने बहुत आत्मविश्वास से हमारी आँखों में आँखें डालकर जवाब दिया – हाँ... पढ़ रहा हूँ।
उसके विनम्र आत्मविश्वास ने हमें चौंकाया – कौन-सी क्लास में...?
10 वीं में – उसने जवाब दिया।
कौन से स्कूल में ...?
उसने शहर के एक बड़े प्राइवेट स्कूल का नाम लिया...। हमने अपनी आँखों को थोड़ा फैलाया... – उसकी फीस तो बहुत ज्यादा है।
हाँ...- अबकी उसने आत्मविश्वास से मुस्कुरा कर जवाब दिया – तभी तो छुट्टी-छुट्टी काम करके फीस जमा करता हूँ। पिता मजदूरी करते हैं, वो हमें रोटी देते हैं। फीस की उम्मीद उनसे नहीं की जा सकती है। पढ़ना चाहता हूँ, इसलिए अपनी फीस का इंतजाम मुझे खुद ही करना चाहिए। बस... टुकड़ों-टुकड़ों में थोड़ा-थोड़ा काम करके साल भर में इतना पैसा जमा कर लेता हूँ कि स्कूल की फीस निकल जाए।
तीन दिन उसने बहुत मेहनत और लगन से काम किया। उसके काम का तरीका देखकर महसूस हुआ कि ये काम उसके पढ़ने के जुनून का हिस्सा है और उसके जुनून का इंप्रेशन भी...। वो काम कर जा चुका है, लेकिन जीवन के अनुभवों पर उसका नक्श हमेशा के लिए अंकित हो गया।
लक्ष्मी – पता नहीं कैसे वो हमारी झोली में आ गिरी थी। हरफनमौला... यूँ काम तो करती थी खाना बनाने का, लेकिन जो काम बताओ उसे पूरे उत्साह से अंजाम देती थी। खाना बनाने से लेकर कपड़ों को ठीक करना, छोटा-मोटा सामान खरीद कर ला देना, बालों में मेंहदी लगा देना या फिर मौका-बे-मौका फेशियल ही कर देना। दीपावली की सफाई की कल्पना तो उसके बिना की ही नहीं जा सकती थी। पिता मंडी में हम्माली करते हैं और माँ प्राइवेट स्कूल में खाना बनाती है। वो खाना बनाने का काम इसलिए करती है ताकि पैसा जमा करके ब्यूटीशियन का कोर्स कर सकें। अभी उसका टारगेट पूरा नहीं हुआ था... भागती हुई हमारे यहाँ खाना बनाने आती थी, यहीं से ट्रेनिंग के लिए... शाम को ट्रेनिंग से लौटते हुए घर आकर खाना बनाती थी और फिर अपने घर जाकर खाना बनाती थी। पिछले दिनों बस का इंतजार करते हुए मिली तो बिल्कुल बदली हुई...। धूप से बचने के लिए आँखों पर काला चश्मा था, जींस पर कुर्ता और छाता लेकर खड़ी थी। हमने पहचान कर लिफ्ट दी तो उसने बताया कि जहाँ उसने ट्रेनिंग की वहीं पर नौकरी भी करने लगी है। महीने भर की तनख्वाह के साथ ही हर फेशियल पर कमीशन अलग...। वो खुश है, क्योंकि उसने अपनी राह तलाशी और मंजिल भी पाई है।
यूँ ये लिस्ट बहुत लंबी है, लेकिन फिलहाल इसमें सिर्फ दो ही लोगों को शामिल किया है। जैसे-जैसे लिखती जाऊँगी इसे विस्तार दूँगी। चूँकि हरेक किरदार अपने-आप में एक पूरी कहानी कहता है, इसलिए ये जरूरी नहीं है कि इसे शृंखलाबद्ध तरीके से ही लिखा जाए। इसलिए इस कड़ी में बस इतना ही... अगली कब होगी, कहा नहीं जा सकता...।

06/11/2011

रास्ते में यूँ ही...!


अपनी गाड़ी खराब होने के दौरान बस के समय को साधने और किसी वजह से बस छूट जाने के बाद बस या ऑटो का इंतजार करना कैसा होता है, ये वो ही समझ सकता है, जिसे ये करना पड़े। जब कभी ऐसा होता तो लगता कि काश कोई महिला अपनी टू-व्हीलर या फिर कार में हमें मुख्य सड़क तक लिफ्ट दे दें, माँगना अपने राम को कभी आया ही नहीं। किसी को अपनी कोई चीज ही दी हो, चाहे उपयोग करने के लिए, उधार (ये तो सिर्फ पैसा ही दिया जाता है) या फिर उपहार में... जरूरत पड़ने पर माँगने में जैसे हमारी ही जान निकल जाती है, तो अब खड़े हुए बस या ऑटो का इंतजार करेंगे, लेकिन लिफ्ट... वो तो नहीं होना। ऐसे ही किसी समय में ये तय किया कि अब अपनी गाड़ी में हम उन महिलाओं और लड़कियों को लिफ्ट देंगे जो हमारे जाने के रास्ते में कहीं भी जाना चाहेंगी। दी तो लड़कों-पुरुषों को भी जा सकती है, लेकिन इसमें बड़ा झंझट है... कई सारे पेंच हैं।
हुआ ये कि जिस दिन ये तय किया उसके बाद कभी ऐसा मौका आ ही नहीं पाया। कभी हम निकले तो बस सामने खड़ी थी, जिसमें चढ़ने के लिए कॉलेज-यूनिवर्सिटी जाती लड़कियाँ इंतजार कर रही थी, तो कभी पूरे परिवार के साथ महिला खड़ी थी, तो कभी एकसाथ इतनी लड़कियाँ खड़ी बतिया रही थी कि उन सारी की सारी को गाड़ी में बैठाने की गुँजाइश ही नहीं थी, कुछ और नहीं तो खुद हमें ही इतनी हड़बड़ी होती थी कि गाड़ी रोककर ये पूछना तक समय जाया करना लगता कि – कहाँ जाना है, मैं छोड़ देती हूँ। देखिए नीयत भी हो, इच्छा भी... लेकिन नसीब...! उसका क्या...?

पता नहीं सब कुछ बड़े आराम से करने, सुबह की पूरी दिनचर्या को विलासिता के साथ शब्दशः निभाने और फेसबुक पर लपककर जुगाली करने के बाद भी जल्दी तैयार हो गई। लगा कि आज गाड़ी को भी थोड़ा दुलरा दिया जाए। धूप खासी थी फिर भी कपड़े का एक झटका इधर मारा, एक झटका उधर मारा और ऊब होने लगी तो लगा कि सेल्फ मारे और चलें काम पर। भई देर से जाओ तो शर्मिंदा होओ... जल्दी जाने में कैसी शर्म...? वहाँ पहुँचकर थोड़ा पढ़ने का समय ज्यादा मिल जाएगा। तो दफ्तर के लिए निकल पड़े। आज... हुई मन की...। मुख्य सड़क पर एक दुबली-पतली, छोटे कद की लड़की जींस-टीशर्ट पहने, सिर सहित मुँह को स्कार्फ से ढँके खड़ी थी... हमने गाड़ी रोकी और फिल्म चढ़े दूसरी तरफ वाले शीशों के अंदर से झाँका... लेकिन लड़की ने तो कोई भाव ही नहीं दिया। हम थोड़े आहत हुए, लेकिन तुरंत ध्यान आया... उस बेचारी दिखाई ही नहीं दे रहा होगा... तो थोड़ा झुककर शीशा उतारा... – कहीं छोड़ दूँ? आवाज तो क्या पहुँच रही होगी... बस उसने ही कुछ अपने से समझ लिया... वो करीब आई... मुस्कुराई और कुछ बुदबुदाई। जैसे उसने मेरी बात बिना सुने समझ ली... मैंने भी समझ ली...। दरवाजा खोला और वो अंदर आ बैठी। थोड़ी सकुचाई-सी वो बैठी रही...मैंने पूछा पढ़ती हो (क्योंकि स्कार्फ से चेहरा ढँका होने पर उसका स्टेट्स कि काम करती है या पढ़ रही है, पता नहीं चलता है, फिर बात करने के लिए कोई तो बात हो...)?
उसने कहा – हाँ।
मैंने पूछा – कहाँ?
उसने जवाब दिया – जीडीसी...
ओह तो फिर तो मैं तुम्हें वहाँ तक छोड़ सकती हूँ। वो तो मेरे ऑफिस के रास्ते में ही है। - मैंने उत्साह में आकर कहा।
उसने कहा – मुझे लगा कि आपको दूसरी तरफ जाना होगा।
कहाँ रहती हो से लेकर, क्या पढ़ रही हो तक की सारी बातें हुई। मैंने उसका नाम भी पूछा, लेकिन उसने सिर्फ मेरा सरनेम पूछा और ब्राह्मण पाकर कुछ खुश भी हुई (स्कार्फ बँधे होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाई, लेकिन उसकी आवाज की चहक से मुझे ऐसा अनुमान हुआ)। एक-दो बार मन हुआ कि उससे कहूँ कि अब तो गाड़ी के अंदर हो, स्कार्फ हटा सकती हो... लेकिन कह नहीं पाई। उसका कॉलेज आ चुका था, अब तक भी उसने स्कार्फ नहीं हटाया था। गाड़ी रूकी तो उसने कहा – थैंक्स मैम, नाइस टू मीट यू...।
मैंने भी उसे कहा – सेम हियर... बाय। वो कॉलेज के अंदर चली गई और मैं अपने रास्ते... । विचार चल रहा था, यही लड़की यदि अगली बार कहीं मिली, चाहे स्कार्फ के साथ या फिर बिना स्कार्फ के... मैं उसे नहीं पहचान पाऊँगी...। फिर सवाल उठा कि मैं उसे पहचानना ही क्यों चाहती हूँ। कभी... दिखे तो लगे कि किसी दिन इस लड़की को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा था...। फिर प्रतिप्रश्न – और ऐसा क्यों चाहती हो...? कोई जवाब नहीं मिला...। फिर इन कबाड़ से सवाल जवाब में से एक नायाब निष्कर्ष निकला। ‘अच्छा ही हुआ जो लड़की ने अपना स्कार्फ नहीं हटाया। यदि भविष्य में वो कहीं मिली तो पहचान का कोई चिह्न ही नहीं होगा, मेरे पास इससे ये अहसास भी नहीं होगा कि कभी इसे इसके कॉलेज तक लिफ्ट दी थी...कोई बेकार का अहंकार भाव नहीं उभरेगा... वाह!’ कुछ ऐसा लगा जैसे बाल कटवाने पर, या फिर हर दिन ले जाने वाले बैग की सफाई कर बेकार चीजों को निकाल दिया हो, या फिर कमरे या अलमारी की सफाई कर कबाड़ निकाल दिया हो और सब कुछ हल्का, खुला-खुला और बड़ा-बड़ा-सा लग रहा हो।
फिर विचार उठा, लेकिन वो तो मुझे पहचानती है ना...! हाहाहा.... तो ये उसकी समस्या है:-)