15/12/2011

ज़हन और दिल पर क़ाबिज बाज़ार



रात को कितनी ही जल्दी क्यों न करें सोते-सोते 11.30 हो ही जाती है, लिहाजा सुबह जब नींद खुलती है तो सूरज खिड़कियों पर दस्तक दे रहा होता है। कुमारजी श्याम बजा बाँसुरिया सुना रहे होते हैं और चाय के प्याले के साथ सुबह के अखबार हुआ करते हैं, जिनमें ज्यादातर निगेटिव खबरें होती हैं...। लगभग हर सुबह का यही क्रम हुआ करता है। और हर दिन की शुरुआत अखबारों में छपी खबरें और विज्ञापन देखते-देखते मन के उद्विग्न हो जाने से होती है। यूँ लगता है कि या तो दुनियाभर में बस सब कुछ गलत ही गलत हो रहा है या फिर लगता है कि हमारे आसपास बस अभाव ही अभाव है... सुबह पूरी तरह नकारात्मकता से पगी हुई, तो दिनभर का आलम क्या होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
अच्छा खासा बड़ा, खुला, रोशन और हवादार घर है, लेकिन अखबार में छपने वाले फ्लैट के लुभावने विज्ञापन अहसास दिलाते हैं कि साहब आपके पास तो वॉकिंग जोन, स्विमिंग पुल, कम्युनिटी हॉल वाली टाउनशिप में कोई फ्लैट नहीं है औऱ यदि वो नहीं है तो फिर आपके जीवन में एक बड़ा अभाव है। स्लिमिंग सेंटर के विज्ञापनों में एक हड्डी की मॉडल देखकर लगता है कि कमर और पेट पर कितनी चर्बी चढ़ रही है और ब्यूटी पार्लरों के विज्ञापन चेहरे पर उम्र के निशान दिखाने लगते हैं किसी कॉस्मेटिक सर्जन के विज्ञापन पढ़कर चेहरे की सामान्य बनावट में कमी नजर आने लगती है और कभी लगता है कि यदि डिंपल होता तो शायद चेहरा खूबसूरत होता... किसी सेल का विज्ञापन घरेलू सामानों के अभाव को तो कपड़ों के विज्ञापन नए डिजाइन, पैटर्न आदि के कपड़ों का अभाव अलग तरह के मन को उदास करता है, टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, म्यूजिक सिस्टम, गाड़ी, एयरकंडीशनर, मोबाइल, लैपटॉप आदि यदि नए भी खऱीदे हो तो लगता है कि टेक्नॉलॉजी पुरानी हो गई है। तो चाहे घऱ के किसी भी कोने पर नजर डालों बस कमियाँ ही कमियाँ नजर आती हैं...। यूँ लगता है जैसे जीवन में कमियों के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं। कभी-कभी तो विज्ञापन ये भ्रम तक दे डालते हैं कि हो ना हो, हमें कोई-न-कोई बीमारी जरूर है। और ये सिलसिला रूकता ही नहीं, अखबार से शुरू होकर दफ्तर तक और दफ्तर से घर लौटकर रात को टीवी देखने तक ये बदस्तूर जारी रहता है।
घर से दफ्तर के बीच एक पूरा लंबा-चौड़ा बाजार पसरा हुआ है जिनमें सामानों की शक्ल में अलग-अलग आकार-प्रकार-रंग और पदार्थों के सपने टँगे होते हैं। आते-जाते ये सपने आँखों में उतर जाते और जिंदगी बस इन्हीं सपनों के इर्द-गिर्द चक्कर काटती सी लगती है। चौराहे के सिग्नल पर जब गाड़ी खड़ी थी, तभी पास में मायक्रा आकर रूकी... कितनी खूबसूरत गाड़ी है...! एक ठंडी आह निकली। शो-रूम पर हर दिन आते-जाते मेजेंटा रंग की ड्रेस पर ध्यान अटकता और हर दिन वो सपना जमा होता चला जाता है, बल्कि हर दिन कोई नया सपना साथ आता है। इनमें से कई पूरे किए, लेकिन ये फेहरिस्त कम होने का नाम ही नहीं लेती। इंटरनेट पर सर्फ करो तो पेंशन प्लान से लेकर गर्ल फॉर डेंटिंग तक और डायमंड ज्लैवरी से लेकर निवेश के विकल्पों को सुझाने वाले विज्ञापन... टीवी पर डिटर्जेंट से लेकर कोल्ड ड्रिंक तक और टीवी से लेकर बैंकिंग तक हर चीज का विज्ञापन शाम का समय खा जाता है... गोया बस हर जगह बाजार लगा हुआ है, खरीदो-बेचो... खरीदो-बेचो...।
कभी-कभी तो अपना आप भी बाजार का ही हिस्सा लगने लगता है। आखिर तो किसी भी वक्त खुद को बाजार से बाहर निकाल पाने की मोहलत ही नहीं मिलती है। हर वक्त कोई न कोई जरूरत की चीज याद आती है, कोई न कोई कमी, कोई न कोई सपना... क्या हम उपभोक्ता संस्कृति के प्रतिनिधि उदाहरण हैं? कभी-कभी तो लगता है कि सोते-जागते, हँसते-गाते, खाते-पढ़ते... पूरे समय दिमाग पर बाजार ही हावी रहता है। हो भी क्यों न...! यदि हम घर पर भी रहे तो अखबार, टीवी और इंटरनेट हर जगह बाजार पसरा मिलता है। लगता है कि एक पल को भी बाजार से मुक्ति नहीं है। देखते ही देखते बाजार न सिर्फ हमारे घरों तक आ पहुँचा है, बल्कि इसने हमारे उपर कब्जा कर लिया। अब बस खऱीदने और पुरानी चीजों को निकालने के अतिरिक्त और कोई विचार होता ही नहीं है, लगता है कि बस खऱीदो-बेचो, खऱीदो-बेचो यही है जीवन का ध्येय...।
दिसंबर मध्य में जब सर्दी ने अपनी आमद दर्ज करवा दी है। रात में हल्की धुँध-सी महसूस होती है और रजाई की गर्माहट शिराओं को और मेहंदी हसन की किसी अँधेरी खोह से आती आवाज में – मेरी आहों में असर है कि नहीं, देख तो लूँ... के तल दिमाग के तंतु जब शिथिल होने लगे, तब एक होशमंद विचार कौंधा कि बाजार असल में होश पर ही नहीं, बल्कि जहन और दिल तक पर काबिज़ हो गया है तभी एक सवाल उठा तो क्या बाजार से मुक्ति नहीं हैं?
जवाब मेरे पास नहीं है, क्या आपके पास है!

18/11/2011

इयररिंग...



रविवार का दिन था, उसके फुदकने-खेलने के लिए...। वो यूँ ही घर में उपर से नीचे और नीचे से उपर के चक्कर लगा रही थी। पता नहीं क्यों, उसके बहुत दोस्त नहीं थे। पिता सब्जी लेकर अभी-अभी लौटे थे और वो उस जादू के थैले में से अपने काम की चीजें टटोल रही थी। अरे वाह...! आज तो बहुत कुछ था उस थैले में... सर्दियों के दिन थे – गाजर, मटर और हाँ... बेर भी...। उसने अपनी फ्रॉक को झोलीनुमा बनाया और उसमें अपनी-अपनी छोटी-छोटी मुट्ठी में भरकर मटर और बेर डालने लगी... जब लगा कि अभी गाजर रखने की जगह बचानी है तो दो-तीन बड़ी-बड़ी गाजर उठाकर अपनी झोली में रख ली और गली के मुहाने पर जहाँ तीन-चार रास्ते गुजरते हैं एक मैदान सा बना है, वहाँ पहुँच गई।
ये वही जगह है, जहाँ आसपास के गलियों में रहने वाले सारे बच्चे शाम को खेलने आते हैं। वही एक पत्थर पर वो बैठ गई थी। मैदान सुनसान था वक्त हुआ होगा कोई 10-11 बजे का (सुबह)। उसने इत्मीनान से अपने दोनों पैरों को फैलाकर अपने फ्रॉक की झोली को सहेजकर व्यवस्थित कर लिया। गाजर खाना शुरू किया, फिर मटर... तभी उसके सामने एक 25-27 साल का लड़का आकर खड़ा हो गया। उसने सामने वाली गली की तरफ इशारा कर कहा – उधर गली में 10 पैसे पड़े हैं, चल लेकर आते हैं...। उस 10 साल की बच्ची ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा...। उसने देखा कि उस लड़के ने नीली पेंट पर बहुत सारे खूबसूरत और चटक रंग का कोट पहना हुआ था। बच्ची को उसके कोट के रंग बहुत पसंद आए...।
उस लड़के ने फिर से अपनी बात दोहराई। बच्ची ने कहा – नहीं, मुझे नहीं चाहिए और उसने अपनी झोली में से बेर उठाकर उसकी टोपी काटी। वो लड़का थोड़ी देर असमंजस में खड़ा रहा। फिर उसने कहा – अच्छा, ये तेरे इयररिंग मैं ले लूँ।
बच्ची ने बेर की गुठली चुसते हुए हाँ में सिर हिला दिया। उसने बच्ची के कानों की बालियाँ उतारी और लेकर चला गया। वो वहाँ वैसे ही अकेले बैठी रही। गाजर और मटर पहले ही खत्म हो चुकी थी, सारे बेर खत्म किए और खड़े होकर अपनी फ्रॉक झाड़ी...। थोड़ी देर यूँ ही बैठी रही और फिर घर लौट आई। माँ ने खाने के लिए कहा तो वो अपनी छोटी थाली लेकर बैठ गई। माँ थाली में रोटी रख रही थी तो उसने जोर-जोर से सिर हिलाकर इंकार किया, पता नहीं कैसे माँ की नजर उसके कानों पर गई। तेरी बालियाँ कहाँ गई? – माँ ने जोर देकर पूछा।
उसने बहुत निस्संगता से दाल-चावल का कोर बनाते हुए बताया – वो एक अंकल ले गए।
अब माँ घबराई... – कौन अंकल? औऱ तूने मना नहीं किया...? – माँ ने झल्ला कर पूछा।
वो अंकल जो गली वहाँ मैदान में मिले थे...। उसने उसी निस्संगता से माँ से कहा और सोचने लगी कि माँ इतना क्यों झल्ला रही है? अबकी माँ खड़ी हो गई और उसका हाथ पकड़कर घर के आँगन में ले आई। पिता, दादा-दादी सबके सामने उन्होंने सारी बात बताई। और फिर सारे लोग उसे उस जगह ले गए। उससे पूछा – तूने देखा वो अंकल किस तरफ गए हैं?
उसने भी हाथ के इशारे से बाँई और जाती गली बता दी... लेकिन सारे लोगों की घबराहट का कारण उसे समझ नहीं आ रहा था। दादी ने पूछा – कित्ती देर से पहले की बात है?
उसने बहुत लापरवाही से कंधे उचका कर कहा – बहुत देर हो गई।
इतना सुनते ही सारे लोग निराश हो चुके थे, अब तक तो पता नहीं कहाँ का कहाँ पहुँच गया होगा। हुआ क्या था? अब ये सवाल उठा। उस बच्ची ने सारी घटना सिलसिलेवार सुना दी। अरे... ! 10 पैसे के लालच में इसने अपने इयररिंग गवाँ दिए...। – माँ ने कहा तो उसने तुरंत प्रतिवाद किया – नहीं पैसे के लालच में नहीं...। लेकिन उसकी बात अनसुनी कर दी गई...।
फिर कई तरह की बातें हुई – अच्छा ही हुआ जो इसने इंकार नहीं किया, क्या पता गला ही दबा देता या फिर उठाकर ही ले जाता। धीरे-धीरे जो हुआ उसे होनी मानकर और उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाया ये सोचकर घरवालों ने सब्र रख लिया। बहुत सालों तक उसने खुद से भी यही सवाल किया कि आखिर जब उस लड़के ने उससे इयररिंग माँगे थे तो उसने इंकार क्यों नहीं किया... लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला... आज भी उसके पास इस बात का जवाब नहीं था। बाद में कई बार ये घटना दोहराई गई और हर बार वो ये सुनकर प्रतिवाद करती कि – ‘10 पैसे के लालच में इसने अपने इयररिंग गवाँ दिए।’ बाद के दिनों ने जब कभी इस घटना को दोहराया जाता और वो वाक्य बोला जाता तो उसे लगता कि क्यों नहीं उसने उस गली में जाकर देखा कम-से-कम ये ‘लालच’ ही कर लेती तो उसे इतना बुरा तो नहीं लगता। फिर घरवालों ने उसे सोना पहनाना बंद कर दिया, बड़े होने पर उसने खुद ही सोने से दूरी बना ली। बड़े हो जाने के बाद इस घटना की दो चीजें उसे शिद्दत से याद रही – 1. उस लड़के का कोट और 2. इस बात पर लगातार का प्रतिवाद कि उसने अपने इयररिंग 10 पैसे के लालच में नहीं दिए थे। हाँ, क्यों दिए थे, ये भी उसे पता नहीं।

इस घटना के बाद सोना (gold) उसके जीवन की ग्रंथि बन गया। खरीदने का मन होता और खरीदती तो है, लेकिन पहनने की न इच्छा होती है और न ही हिम्मत। हाँ लेकिन इससे उसने अपने बारे में दो चीजें जानी एक कि कई बार उसके कुछ करने या न करने के पीछे कोई कारण नहीं होता है और दूसरा वो कभी भी किसी चीज के लिए इंकार नहीं कर पाती है। औऱ ये आज भी उसके साथ है... पता नहीं ये अच्छा है या बुरा...!

12/11/2011

अभिभूत करते लोग... पार्ट – 1


आजकल मुझे वो चीजें अभिभूत करती है, जो हकीकत में कुछ है ही नहीं। चमचमाती गाड़ियाँ, खूबसूरत कपड़े, महँगे गैजेट्स, चौंधियाती पार्टियाँ, खूबसूरत चेहरे, डुबाता संगीत या फिर गहरी किताबें अभिभूत नहीं करती। करते हैं जमीन से जुड़े लोग, स्वार्थ को दरकिनार कर दूसरों के लिए सुविधा जुटाते, हँसते हुए संघर्ष करते, अपने दुख-दर्द को बहुत करीने से सहेजते-सहते, सीखने के लिए खुले हुए, नया करने के लिए राह बनाते-निकालते लोग, छोटे-छोटे, नाजुक और मासूम-से जैस्चर्स और मीठे-मीठे रिश्ते... कहीं ठहर जाते हैं, भीतर और उस तरह उतरते चले जाते हैं जैसे बारिश की फुहारों का पानी उतरता रहता है जमीन के अंदर.... गहरे.... गहरे और गहरे...। अजीब है, लेकिन है... इन दिनों ऐसा ही कुछ अभिभूत करता है। पिछले कुछ दिनों से कुछ ऐसे ही लोग आसपास से गुजर रहे हैं और जीने का उनका तरीका, परिस्थितियों से लड़ने का साहस और जीवट मेरी यादों की किताब में दर्ज हो रहे हैं, उनके जीवन के गहरे अर्थ खुलते हैं और नया जीवन दर्शन भी मिलता है।
दीपक - वो हमारे घर पुताई करने के लिए आया था। रैक की किताबों को बहुत गौर से देख रहा था। यूँ ही पूछ लिया पढ़ते हो...। उसने बड़ी विनम्रता से नजरें झुकाकर गर्दन हाँ में हिला दी। हमने बड़े आश्चर्य से फिर से अपना सवाल दोहराया – पढ़ते हो?
इस बार उसने बहुत आत्मविश्वास से हमारी आँखों में आँखें डालकर जवाब दिया – हाँ... पढ़ रहा हूँ।
उसके विनम्र आत्मविश्वास ने हमें चौंकाया – कौन-सी क्लास में...?
10 वीं में – उसने जवाब दिया।
कौन से स्कूल में ...?
उसने शहर के एक बड़े प्राइवेट स्कूल का नाम लिया...। हमने अपनी आँखों को थोड़ा फैलाया... – उसकी फीस तो बहुत ज्यादा है।
हाँ...- अबकी उसने आत्मविश्वास से मुस्कुरा कर जवाब दिया – तभी तो छुट्टी-छुट्टी काम करके फीस जमा करता हूँ। पिता मजदूरी करते हैं, वो हमें रोटी देते हैं। फीस की उम्मीद उनसे नहीं की जा सकती है। पढ़ना चाहता हूँ, इसलिए अपनी फीस का इंतजाम मुझे खुद ही करना चाहिए। बस... टुकड़ों-टुकड़ों में थोड़ा-थोड़ा काम करके साल भर में इतना पैसा जमा कर लेता हूँ कि स्कूल की फीस निकल जाए।
तीन दिन उसने बहुत मेहनत और लगन से काम किया। उसके काम का तरीका देखकर महसूस हुआ कि ये काम उसके पढ़ने के जुनून का हिस्सा है और उसके जुनून का इंप्रेशन भी...। वो काम कर जा चुका है, लेकिन जीवन के अनुभवों पर उसका नक्श हमेशा के लिए अंकित हो गया।
लक्ष्मी – पता नहीं कैसे वो हमारी झोली में आ गिरी थी। हरफनमौला... यूँ काम तो करती थी खाना बनाने का, लेकिन जो काम बताओ उसे पूरे उत्साह से अंजाम देती थी। खाना बनाने से लेकर कपड़ों को ठीक करना, छोटा-मोटा सामान खरीद कर ला देना, बालों में मेंहदी लगा देना या फिर मौका-बे-मौका फेशियल ही कर देना। दीपावली की सफाई की कल्पना तो उसके बिना की ही नहीं जा सकती थी। पिता मंडी में हम्माली करते हैं और माँ प्राइवेट स्कूल में खाना बनाती है। वो खाना बनाने का काम इसलिए करती है ताकि पैसा जमा करके ब्यूटीशियन का कोर्स कर सकें। अभी उसका टारगेट पूरा नहीं हुआ था... भागती हुई हमारे यहाँ खाना बनाने आती थी, यहीं से ट्रेनिंग के लिए... शाम को ट्रेनिंग से लौटते हुए घर आकर खाना बनाती थी और फिर अपने घर जाकर खाना बनाती थी। पिछले दिनों बस का इंतजार करते हुए मिली तो बिल्कुल बदली हुई...। धूप से बचने के लिए आँखों पर काला चश्मा था, जींस पर कुर्ता और छाता लेकर खड़ी थी। हमने पहचान कर लिफ्ट दी तो उसने बताया कि जहाँ उसने ट्रेनिंग की वहीं पर नौकरी भी करने लगी है। महीने भर की तनख्वाह के साथ ही हर फेशियल पर कमीशन अलग...। वो खुश है, क्योंकि उसने अपनी राह तलाशी और मंजिल भी पाई है।
यूँ ये लिस्ट बहुत लंबी है, लेकिन फिलहाल इसमें सिर्फ दो ही लोगों को शामिल किया है। जैसे-जैसे लिखती जाऊँगी इसे विस्तार दूँगी। चूँकि हरेक किरदार अपने-आप में एक पूरी कहानी कहता है, इसलिए ये जरूरी नहीं है कि इसे शृंखलाबद्ध तरीके से ही लिखा जाए। इसलिए इस कड़ी में बस इतना ही... अगली कब होगी, कहा नहीं जा सकता...।

06/11/2011

रास्ते में यूँ ही...!


अपनी गाड़ी खराब होने के दौरान बस के समय को साधने और किसी वजह से बस छूट जाने के बाद बस या ऑटो का इंतजार करना कैसा होता है, ये वो ही समझ सकता है, जिसे ये करना पड़े। जब कभी ऐसा होता तो लगता कि काश कोई महिला अपनी टू-व्हीलर या फिर कार में हमें मुख्य सड़क तक लिफ्ट दे दें, माँगना अपने राम को कभी आया ही नहीं। किसी को अपनी कोई चीज ही दी हो, चाहे उपयोग करने के लिए, उधार (ये तो सिर्फ पैसा ही दिया जाता है) या फिर उपहार में... जरूरत पड़ने पर माँगने में जैसे हमारी ही जान निकल जाती है, तो अब खड़े हुए बस या ऑटो का इंतजार करेंगे, लेकिन लिफ्ट... वो तो नहीं होना। ऐसे ही किसी समय में ये तय किया कि अब अपनी गाड़ी में हम उन महिलाओं और लड़कियों को लिफ्ट देंगे जो हमारे जाने के रास्ते में कहीं भी जाना चाहेंगी। दी तो लड़कों-पुरुषों को भी जा सकती है, लेकिन इसमें बड़ा झंझट है... कई सारे पेंच हैं।
हुआ ये कि जिस दिन ये तय किया उसके बाद कभी ऐसा मौका आ ही नहीं पाया। कभी हम निकले तो बस सामने खड़ी थी, जिसमें चढ़ने के लिए कॉलेज-यूनिवर्सिटी जाती लड़कियाँ इंतजार कर रही थी, तो कभी पूरे परिवार के साथ महिला खड़ी थी, तो कभी एकसाथ इतनी लड़कियाँ खड़ी बतिया रही थी कि उन सारी की सारी को गाड़ी में बैठाने की गुँजाइश ही नहीं थी, कुछ और नहीं तो खुद हमें ही इतनी हड़बड़ी होती थी कि गाड़ी रोककर ये पूछना तक समय जाया करना लगता कि – कहाँ जाना है, मैं छोड़ देती हूँ। देखिए नीयत भी हो, इच्छा भी... लेकिन नसीब...! उसका क्या...?

पता नहीं सब कुछ बड़े आराम से करने, सुबह की पूरी दिनचर्या को विलासिता के साथ शब्दशः निभाने और फेसबुक पर लपककर जुगाली करने के बाद भी जल्दी तैयार हो गई। लगा कि आज गाड़ी को भी थोड़ा दुलरा दिया जाए। धूप खासी थी फिर भी कपड़े का एक झटका इधर मारा, एक झटका उधर मारा और ऊब होने लगी तो लगा कि सेल्फ मारे और चलें काम पर। भई देर से जाओ तो शर्मिंदा होओ... जल्दी जाने में कैसी शर्म...? वहाँ पहुँचकर थोड़ा पढ़ने का समय ज्यादा मिल जाएगा। तो दफ्तर के लिए निकल पड़े। आज... हुई मन की...। मुख्य सड़क पर एक दुबली-पतली, छोटे कद की लड़की जींस-टीशर्ट पहने, सिर सहित मुँह को स्कार्फ से ढँके खड़ी थी... हमने गाड़ी रोकी और फिल्म चढ़े दूसरी तरफ वाले शीशों के अंदर से झाँका... लेकिन लड़की ने तो कोई भाव ही नहीं दिया। हम थोड़े आहत हुए, लेकिन तुरंत ध्यान आया... उस बेचारी दिखाई ही नहीं दे रहा होगा... तो थोड़ा झुककर शीशा उतारा... – कहीं छोड़ दूँ? आवाज तो क्या पहुँच रही होगी... बस उसने ही कुछ अपने से समझ लिया... वो करीब आई... मुस्कुराई और कुछ बुदबुदाई। जैसे उसने मेरी बात बिना सुने समझ ली... मैंने भी समझ ली...। दरवाजा खोला और वो अंदर आ बैठी। थोड़ी सकुचाई-सी वो बैठी रही...मैंने पूछा पढ़ती हो (क्योंकि स्कार्फ से चेहरा ढँका होने पर उसका स्टेट्स कि काम करती है या पढ़ रही है, पता नहीं चलता है, फिर बात करने के लिए कोई तो बात हो...)?
उसने कहा – हाँ।
मैंने पूछा – कहाँ?
उसने जवाब दिया – जीडीसी...
ओह तो फिर तो मैं तुम्हें वहाँ तक छोड़ सकती हूँ। वो तो मेरे ऑफिस के रास्ते में ही है। - मैंने उत्साह में आकर कहा।
उसने कहा – मुझे लगा कि आपको दूसरी तरफ जाना होगा।
कहाँ रहती हो से लेकर, क्या पढ़ रही हो तक की सारी बातें हुई। मैंने उसका नाम भी पूछा, लेकिन उसने सिर्फ मेरा सरनेम पूछा और ब्राह्मण पाकर कुछ खुश भी हुई (स्कार्फ बँधे होने की वजह से उसका चेहरा नहीं देख पाई, लेकिन उसकी आवाज की चहक से मुझे ऐसा अनुमान हुआ)। एक-दो बार मन हुआ कि उससे कहूँ कि अब तो गाड़ी के अंदर हो, स्कार्फ हटा सकती हो... लेकिन कह नहीं पाई। उसका कॉलेज आ चुका था, अब तक भी उसने स्कार्फ नहीं हटाया था। गाड़ी रूकी तो उसने कहा – थैंक्स मैम, नाइस टू मीट यू...।
मैंने भी उसे कहा – सेम हियर... बाय। वो कॉलेज के अंदर चली गई और मैं अपने रास्ते... । विचार चल रहा था, यही लड़की यदि अगली बार कहीं मिली, चाहे स्कार्फ के साथ या फिर बिना स्कार्फ के... मैं उसे नहीं पहचान पाऊँगी...। फिर सवाल उठा कि मैं उसे पहचानना ही क्यों चाहती हूँ। कभी... दिखे तो लगे कि किसी दिन इस लड़की को मैंने उसके कॉलेज छोड़ा था...। फिर प्रतिप्रश्न – और ऐसा क्यों चाहती हो...? कोई जवाब नहीं मिला...। फिर इन कबाड़ से सवाल जवाब में से एक नायाब निष्कर्ष निकला। ‘अच्छा ही हुआ जो लड़की ने अपना स्कार्फ नहीं हटाया। यदि भविष्य में वो कहीं मिली तो पहचान का कोई चिह्न ही नहीं होगा, मेरे पास इससे ये अहसास भी नहीं होगा कि कभी इसे इसके कॉलेज तक लिफ्ट दी थी...कोई बेकार का अहंकार भाव नहीं उभरेगा... वाह!’ कुछ ऐसा लगा जैसे बाल कटवाने पर, या फिर हर दिन ले जाने वाले बैग की सफाई कर बेकार चीजों को निकाल दिया हो, या फिर कमरे या अलमारी की सफाई कर कबाड़ निकाल दिया हो और सब कुछ हल्का, खुला-खुला और बड़ा-बड़ा-सा लग रहा हो।
फिर विचार उठा, लेकिन वो तो मुझे पहचानती है ना...! हाहाहा.... तो ये उसकी समस्या है:-)