03/08/2009

सच क्यों हो रूसवा...?



छुट्टी का दिन एक बेहतर अनुभव के साथ उगा यूँ दीगर परेशानियों की किरकिरी तो साथ ही रहती है, लेकिन जैसा कि दर्द की शुरूआत में वह शरीर के किसी कोने में आराम से आश्रय पा लेता है, इसी तरह परेशानी की शुरूआत पहले तो बस जगह ही घेरती है फिर.... फिर का कह नहीं सकते हैं। तो बिना घड़ी की सुईयों को देखें बस प्रवाह का हिस्सा हुए... लेकिन ज्यादा देर तक ये सब नहीं चल पाया। आखिरकार घर में हर जगह टँगे उस अनुशासन का क्या किया जाए जो कमोबेश हमारी बॉयोलॉजी का भी हिस्सा हो चुका है... तो सुई का सिरा भी हाथ में आ गया फिर भी मंथर हवा सा दिन उड़ रहा था।
अचानक बहस का रिपीट टेलीकॉस्ट देखकर रिमोट पर अगला-अगला स्विच दबाती उँगली रुक गई.... बहस चल रही थी टीवी रियलिटी शो सच का सामना पर....। कोई पक्ष में तो कोई विपक्ष में अपने भोथरे और धारदार तर्क फेंक रहा था। किसी की ढाल भारतीय संस्कृति थी तो किसी की ढाल सच....। अब कोई इनसे पूछे कि सच क्या है? और कोई ये भी पूछ ले कि आखिर ये संस्कृति किस चिड़िया का नाम है थोड़ी फुर्सत हो तो लगे हाथ ये भी बता दें। खैर साहब... इसी बीच राजेश ने बताया कि उनेक कॉलेज के प्यून ने उन्हें बताया कि कैंटीन में बच्चे सच का सामना खेल खेलने लगे हैं। टीवी ने एक नया खिलौना जो दिया है बच्चों को भी और बड़ों को भी (तभी तो संसद का कीमती समय और ऊर्जा इस नामालूम से प्रोग्राम के पीछे खर्च की जा रही है।) ठीक भी है जब आप सारे देश के सामने सच का ढिंढोरा पीट रहे हो तो फिर बच्चे अपने सर्कल में सच क्यों नहीं बोल सकते? आखिरकार एक बुरी तरह से बदनाम माध्यम ने देश में सच बोलने की लहर तो पैदा की, लेकिन मजा तब है जब वह व्यक्तिगत सच की बजाय सार्वजनिक सच को सार्वजनिक करे, क्योंकि व्यक्तिगत सच समाज में सिर्फ सनसनी पैदा करते हैं, ये एक तरह से किसी के बेडरूम में घुसने की चेष्टा है, एक नितांत घटिया किस्म का मनोरंजन... अब जो इसके पक्षधर है, वे कहते हैं कि हम सच बोलकर हल्के हो गए.... तो यह भी बताएँ कि आखिर आपकों अपनों से जुड़े सच को कहने के लिए किसी मंच की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या आप यूँ ही उन्हें अपने सच नहीं बता सकते? और आपके नितांत व्यक्तिगत सच से किसी का क्या फायदा या नुकसान होना है? तो फिर इस सारे अनुष्ठान के पीछे कहीं पैसा और राखी सावंत(हाँ राखी के स्वयंवर पर भी चर्चा की जा सकती है, लेकिन एक वक्त में एक ही मामले को फोकस करने का खुद से किया वादा अभी निभा हुआ है) नुमा पब्लिसिटी की वासना तो नहीं है? क्या ये भी आप पोलिग्राफी टेस्ट में कबूल कर रहे हैं....? गुजारिश है कि इस पर भी गौर फरमाए।
जहाँ तक संस्कृति का सवाल है तो इसी संस्कृति में ब्रह्मा भी है और कृष्ण भी अहिल्या का प्रकरण भी है और रावण का भी... तो संस्कृति का तो ऐसा कोई कार्यक्रम क्या बिगाड़ेगा? हाँ इससे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास समय को भरने के लिए खासा मसाला जुट जाता है। और जो अपना समय और ऊर्जा इस कार्यक्रम को देखने और इस पर बहस करने में बिताते है, वे बेचारे ठगे जाते हैं.... हाँ लिखने वाले और पढ़ने वाले भी दोनों.....अब इसके लिए आप मुझे माफ करेंगे।

3 comments:

  1. हमने तो टी वी देखना ही बन्द कर दिया ब्लाग पर सब कुछ पता चल ही जाता है हा हा हा बडिया लिखा है आभार्

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  2. we r live in the age of conspirecies !

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  3. nice post

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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