06/03/2011

पहली मुहब्बत-सा नशा...


कोई बेचैनी, कोई छटपटाहट तो जरूर ही रही होगी नहीं तो मीठी-सी खुनक वाली रविवार की सुबह गर्म चाय के कप के साथ चल रही चुहल के बीच यूथनेशिया और मर्सी कीलिंग जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर बहस नहीं करती, लेकिन बहस नहीं करती, ये तो थोड़ा मुश्किल है... तो ठीक है बहस तो करती लेकिन यूँ ही बहस करते-करते भावुक होकर रो नहीं पड़ती। कई साल पहले सुना था अरूणा शानबाग का नाम... फिर ये नाम कहीं खो गया था। इन दिनों फिर चर्चा में है... कल अरूणा शानबाग की मर्सी कीलिंग की अपील पर फैसला आने वाला है और इसी सिलसिले में अखबार पढ़ते हुए बहस शुरू हुई थी। मर्सी कीलिंग पर अपना पक्ष इतनी शिद्दत से रख रही थी कि अब सोचती हूँ तो लगता है जैसे मैं अपनी ही मर्सी कीलिंग की अपील कर रही हूँ... अजीब है ना... पता नहीं कौन-सा दुख याद आया था... या शायद अंदर उबल रही बेचैनी का रिएक्शन था वो आवेग... खैर बच्चों की तरह बहलाई गई हूँ – असहमत की सहमति से...।
बहल तो गई, लेकिन कोई खराश बची रह गई। अपने ही बनाए नियम तोड़ते हुए थोड़ी देर फेसबुक पर जुगाली की... लेकिन खराश रह-रह कर महसूस हो रही थी। अचानक किताबों की रैक पर ऊँगलियाँ दौड़ने लगी... जिस किताब पर रूकी उसे खींच कर बाहर निकाला। वो बहुत पहले पढ़ी थी, पन्ने जर्जर हो रहे हैं और कवर पर धूल जमी हुई थी। मोटा-मोटी किताब क्या है ये तो याद है, लेकिन बाकी सारी चीजें भूल चुकी हूँ। किताब की धूल साफ करते हुए सोचती जा रही हूँ कि इस बीच ऐसा नहीं रहा कि पढ़ा नहीं, फिर ऐसा क्यों महसूस हो रहा है जैसे हम जिससे प्यार करते हैं उससे कई महीनों बाद मिल रहे हैं... सच... किताब के हाथ में आ जाने से... नहीं, किसी जमाने में पढ़ी किताब के हाथ में आने से एक झुरझुरी-सी हथेली से चलकर पूरे बदन में फैल गई, एक सनसनाहट-सी हुई और बहुत रूमानी एहसास होने लगा। किताब नहीं हो जैसे वो दौर ही सामने आ खड़ा हुआ हो, जिसमें इसे पढ़ा गया हो... हथेली लगातार धूल... धूल के भ्रम को साफ करती जा रही है, लेकिन लग रहा है जैसे उसके नीचे से एक गुनगुना समय गुजर रहा है, वो लापरवाही, वो सपने, उत्साह, रूमानियत जैसे हथेली को छूकर बहती जा रही हो लगातार। जैसे किताब नहीं हो प्यार हो... वो भी पहला। एक आश्वासन, इस बेचैनी के गुजर जाने का, कुछ भी के अनजाने, ना-पहचाने और अनचिह्ने नहीं रहने का, आश्वासन कि कोई छटपटाहट नहीं रहेगी यदि किताबें रहेंगी। कितना गहरा ... तड़प कम हुई है किताब के हाथ आने से... पढ़ते हुए शायद करार भी आ जाए। बहुत मुद्दत बाद किताबों के बीच आ खड़ी हूँ उस अहसास के साथ जैसे पहली बार प्यार करने पर होता है नशा...। फिर से याद आया कि कभी हुआ करता था, पढ़ने से भी नशा... फिर से वहाँ खड़ी हूँ और खुश हूँ... बहुत.... बहुत... बहुत..., क्योंकि पढ़ना ठीक वैसा ही है, जैसा प्यार करना...

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