08/04/2012

कई मायनों में इंसान से बेहतर है जानवर....

सुबह जल्दी उठ पाओ तो दिन कितना संभावनाओं भरा हो जाता है... कोई टुकड़ा अपने लिए भी बचाया जा सकता है, किसी में सपने भरे जा सकते हैं और किसी हिस्से को बस यूँ ही हवाओं में उड़ाया भी जा सकता है... उस सुबह का वो ऐसा ही खास समय था। अखबार आस-पास सरसरा रहे थे, लेकिन विचार शून्यता की ही-सी स्थिति थी। निर्विकार भाव से आँखें हरेक चीज का जायजा ले रही थी, लेकिन इसमें न तो कुछ पा लेने की जल्दी थी न कुछ ठीक करना था और न ही कोई उद्विग्नता थी.... चाय के कप, अभी-अभी पढ़कर छोड़े पन्ने-पन्ने रखे हुए अखबार... खुली हुई चादरें, टेबल पर नई सीडी के रैपर, मुँह खोले पड़ा लैपटॉप और रात को पढ़ते-पढ़ते उल्टी कर रख छोड़ी किताब सिरहाने पड़ी थी। खिड़की से रोशनी आ रही थी और अलस्सुबह की हल्की ठंडक भी... हर चीज जैसे उसी जगह के लिए बनी हुई थी। इस वक्त ना तो किसी तरह की कोई हड़बड़ी थी, न आगे की योजना थी, वक्त जैसे हवा में उड़ाने के लिए ही बचा हुआ था। यूँ ही विचार तंद्रा की तरह थे कि खिड़की की फ्रेम पर गिलहरी उछल-कूद करती नजर आई। तंद्रा भंग हो गई... नजरें टिक गईं। बँटने के लिए ही तो रोशनी और दिन हुआ करता है। अचानक वो कूलर पर नजर आई। उसके मुँह में कपड़े का छोटा-सा टुकड़ा था, जिसे वो कूलर के अंदर डालने की कोशिश कर रही थी। करीब 40-45 सेकंड तक वो उस कोशिश में लगी रही... उसी दौरान एक और गिलहरी वहाँ आ गई। फिर दोनों बाहर की तरफ से उस कपड़े को अंदर ठेलने की कोशिश करती रहीं... ये क्रम भी 10-12 सेकंड तक चलता रहा। जो गिलहरी कपड़ा लेकर आई थी, वो अचानक उस कपड़े और दूसरी गिलहरी को छोड़कर चली गई। शायद दोनों इस बात से मुत्तमईन हो गई थीं कि कपड़ा अटक गया है और अब गिरेगा नहीं... कितने कौशल से दोनों ने उस कपड़े को अटका दिया था। बहुत कौतूहल था उन गिलहरियों की गतिविधियाँ को लेकर, एकबारगी ये विचार आया कि क्यों नहीं इसे कैमरे से शूट कर लिया जाए...! लेकिन कुछ सोचकर इस विचार को स्थगित कर दिया और नजरें पूरी तरह से वहीं गड़ा दी...। दूसरी गिलहरी और थोड़ी देर तक कपड़े को अंदर डालने की कोशिश करती रही... फिर एकाएक वो कूलर के अंदर घुस गई और उसने अंदर से उस कपड़े को खींच लिया... मैं हतप्रभ... कितनी योजना, कितना सामंजस्य... कितनी समझ, कितना प्यार... और कितनी बुद्धि। विचारों के प्रवाह को जैसे एक झटका लगा था। बचपन में ही सुना था कि इंसान और जानवर के बीच का एकमात्र फर्क ये है कि इंसान के पास बुद्धि होती है, कहा किसी बड़े ने था सो मानना ही था...। मान लिया, भूल गए कि बारिश से पहले चींटियाँ अपना खाना जमा करती है, क्यों ऐसा होता है जिस रास्ते से घुस कर बिल्ली को खाने-पीने के लिए मिलता है, वो बार-बार उसी रास्ते का इस्तेमाल करती है। भूल गए कि हमारे बुजुर्गों ने अपने जीवन के कई सारे अनुभव जीव-जंतुओं के व्यवहार से ही वेरीफाई किए हैं। जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने 1958 में जापान के एक द्वीप पर एक मादा बंदर को आलूओं को धोकर खाते देखा था, बाद के सालों में उन्होंने ये पाया कि वहाँ के बंदरों की अगली पीढ़ी के बच्चों ने भी इसी पद्धति को अपनाया... तो क्या मादा बंदर का नवाचार उसकी बुद्धि का पता नहीं देता है? और क्या उसका अनुसरण जंतुओं में बुद्धि का पता नहीं देती है... ! याद आता है माँ का कहा कि काली चींटी काटती नहीं है। इसलिए बहुत बचपन में दोनों हाथों की पहली ऊँगलियों औऱ अंगूठों को जोड़कर काली चींटी के इर्दगिर्द पाननुमा घेरा बना लेते... वो लगातार घेरे से निकलने का रास्ता ढूँढती रहती, कई बार वो हाथ पर चढ़ भी जाती है। कभी इस खेल को आगे बढ़ाने के लिए जरा सा रास्ता निकालते तो वो खट से उससे बाहर निकलने की जुगत लगा लेती... तो फिर ये कैसे कहा जा सकता है कि जीव-जंतुओं के पास बुद्धि नहीं होती...? बाद में अलग-अलग अनुसंधानों ने भी ये सिद्ध किया कि जीव-जंतुओं में भी बुद्धि होती है, प्यार, संवेदना, समझ, अपनापन सब कुछ होता है...। भाषा भी होती है, अब ये हमारे ज्ञान की सीमा है कि हम ना तो उनकी भाषा समझ पाते हैं और न हीं उनके बीच के आपसी संबंधों को...। तो फिर हम कैसे कह सकते हैं कि हम इंसानों के पास कुछ ऐसा है जो अतिरिक्त है... जैसे बुद्धि...! लेकिन सही है, कुछ तो है जो इंसानों के पास प्रकृति की हर सजीव देन से ज्यादा है... जाहिर है, तभी विकास भी है, विनाश भी और असंतुलन भी...। दरअसल इंसान के पास नकारात्मक बुद्धि है। हवस, ईर्ष्या, हिंसा, क्रोध, द्वेष, स्वार्थ और लालच जिसके स्वभाव का हिस्सा है, और जो अपनी हवस और अहम की पूर्ति के लिए प्रकृति, जीव-जंतुओं और अपने सहोदरों को बेवजह भी नुकसान पहुँचाता है। तो जो कुछ विकास-विनाश, प्रसार-फैलाव है, जो इस लालच और हवस की ही देन है, तो हुआ ना इंसान ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति...:-(

01/04/2012

पिद्दी से हम... !

गर्मी बस शुरू हुई ही है, लेकिन लगता है जैसे देरी की सारी कोर-कसर पूरी कर लेगी। घर-दफ्तर का तनाव, गर्मी, रात की टूटी-फूटी, अधूरी-सी नींद से जो होना था, वो हुआ... माइग्रेन...। कामवाली काम छोड़ गई तो दर्द को सहलाने की लक्जरी की न तो सहूलियत थी और न ही गुंजाईश... काम निबटाकर टीवी के सामने आसन जमाकर खाना-खाने बैठे तो हाल ही में खोजे मूवी चैनल पर फिल्म चल रही थी, नोईंग...। फिल्म का नायक जोनाथन अपनी एस्ट्रोफिजिक्स की क्लास में थ्योरी ऑफ डेटरमिनिज्म एंड थ्योरी ऑफ रेनडमनेस की चर्चा कर रहा था। थ्योरी ऑफ डेटरमिनिज्म से मतलब है कि हरेक चीज तयशुदा है, और इसलिए हर चीज का कोई-न-कोई मतलब है। इसके उलट है थ्योरी ऑफ रेनडमनेस... इसके अनुसार किसी भी चीज का कोई मतलब नहीं है और ये सृष्टि पूरी तरह से इत्तफाक पर चल रही है। आँखें दर्द और टीवी की बदलती रोशनी से तन रही थी, लगातार सो जाने की इच्छा होने लगी थी, लेकिन फिल्म की शुरुआत ही इतनी शानदार लगी कि फिल्म छोड़कर सो जाने का विचार ही बुरा लगा था। आखिर तो फिल्म की शुरुआत में ही हमारी मुठभेड़ एक सिद्धांत, एक विचार से हुई है और बस इसीलिए तो पूरी दुनिया के कार्य-व्यापार में लगे रहते हैं... लेकिन हमारा शरीर हमारी इच्छाओं का गुलाम नहीं होता है, तो बड़े बेमन से ये सोचते हुई वहाँ से उठ खड़े हुए कि जब फिल्म की शुरुआत में ही ‘कुछ’ मिल गया है तो फिर मलाल किस बात का...! दर्द था, थोड़ी नींद और थोड़ी जाग्रति भी थी... कुल मिलाकर मस्तिष्क का कोई हिस्सा चैतन्य था...। वहाँ रोशन थी वो रात जब ना तो एस्ट्रोफिजिक्स था ना फिजिक्स का पी ही था, बस था तो एक अनगढ़-सा विचार... एक सवाल और बहुत सारी उद्विग्नता...। यदि हमारा होना तयशुदा है तो फिर हमसे जुड़ी हर चीज तय है... फिर हमारे करने, होने का मतलब ही नहीं है कुछ...। और यदि हम इत्तफाक से हैं तब भी हम क्या है? बस महज एक इत्तफाक... । जरा दूर से देखें तो लगता है कि सृष्टि के इस विराट में हमारी हस्ती ही क्या है...? महासागर में एक बूँद-सी... तो क्या बूँद और क्या उसका वजूद...। ये महासागर अनंतकाल से है और अनंतकाल तक रहेगा, उसमें हमारा आना और जाना ठीक वैसा है, जैसा किसी एक फूल का खिलना और फिर सूखकर बिखर जाना... अनगिनत बूँदों में एक का होना न होना... कोई फर्क पड़ता है, यदि न हो तो... ! यदि सृष्टि के विकास-क्रम की दृष्टि से देखें तो शायद इतना भी नहीं... तो फिर हमें हमारा सब-कुछ इतना बड़ा क्यों लगने लगता है... ? क्या वाकई हम इतने ही हैं...! यदि हम इतने ही है तो फिर हमारा पूरा जीवन क्या है... क्या है हमारे संघर्ष-उपलब्धि, दुख-सुख, रिश्ते-नाते, जीवन-मृत्यु, उदात्तता-क्षुद्रता, प्यार-नफरत, ... क्या है, क्यों हैं और इनके होने का अर्थ क्या है? या तो ये सब इत्तफाक है या फिर ये बेवजह है...। दोनों ही स्थितियों में हमारे ‘स्व’ का अर्थ क्या होगा...? यदि ये इत्तफाक है तो फिर हम खुद भी इत्तफाक हैं और इत्तफाक की अपनी सत्ता क्या है? वो तो बस इत्तफाक से ही है ना... फिर हमारे होने के गुरूर की कोई वजह होनी ही नहीं चाहिए... और यदि ये बेवजह है तो फिर हमारा वजूद ही बेवजह है... तो इससे जुड़ी हर चीज बेवजह है। तो फिर ये स्वत्व-बोध तक बेवजह है... फिर कैसे इंसानी सुख-दुख सृष्टि से उपर, उससे भारी हो जाते है...? और क्यों...? शायद हममें उस विराट संरचना को देख पाने की काबिलियत, लियाकत ही नहीं है, इसीलिए हम अपने दुख-सुख में ही डूबे रहते हैं, या फिर चूँकि हममें ये कूव्वत नहीं है, इसलिए इन्हीं में डूबे रहना हमारे लिए श्रेयस्कर है... ! हम इतने ही हैं, सृष्टि की संरचना में होना ही महज हमारा एक योगदान है, हम इसमें न कुछ जोड़ते हैं और न ही कम कर सकते हैं। यही निराशा है, यही हमारे स्व की सीमा, यही बेबसी है और यही है हमारी क्षुद्रता... :-c

23/03/2012

नवीन का स्वागत है...



पतझड़ और वसंत साथ-साथ आते हैं। प्रकृति की इस व्यवस्था के गहरे संकेत-संदेश हैं। अवसान-आगमन, मिलना-बिछड़ना, पुराने का खत्म होना-नए का आना... चाहे ये हमें असंगत लगते हों, लेकिन हैं ये एक ही साथ...। एक ही सिक्के के दो पहलू, जीवन का सत् और सार दोनों ही... वसंत ऋतु का पहला हिस्सा पतझड़ का हुआ करता है... पेड़ों, झाड़ियों, बेलों और पौधों के पत्ते सूखते हैं, पीले होते हैं और फिर मुरझाकर झड़ जाते हैं। उन्हीं सूखी, वीरान शाखाओं पर नाजुक कोमल कोंपले आनी शुरू हो जातीं हैं, यहीं से वसंत ऋतु अपने उत्सव के चरम पर पहुँचती है।
फागुन और चैत्र वंसत के उत्सव के महीने हैं। इसी चैत्र के मध्य में जब प्रकृति अपने शृंगार की... सृजन की प्रक्रिया में होती है। लाल, पीले, गुलाबी, नारंगी, नीले, सफेद रंग के फूल खिलते हैं। पेड़ों पर नए पत्ते आते हैं और यूँ लगता है कि पूरी की पूरी सृष्टि ही नई हो गई है, ठीक इसी वक्त हमारी भौतिक दुनिया में भी नए का आगमन होता है। नए साल का ... यही समय है नए के सृजन का, वंदन, पूजन और संकल्प का... जब सृष्टि नए का निर्माण करती है, आह्वान करती है, तब ही सांसारिक दुनिया भी नए की तरफ कदम बढ़ाती है। इस दृष्टि से गुड़ी पडवा के इस समय मनाए जाने के बहुत गहरे अर्थ है। पुराने के विदा होने और नए के स्वागत के संदेश देता ये पर्व है, प्रकृति का, सूरज का, जीवन, दर्शन और सृजन का। जीवन-चक्र का स्वीकरण, सम्मान और अभिनंदन और उत्सव है गुड़ी पड़वा। तो हम भी प्रकृति के इस उत्सव को मनाएँ... सूरज का अभिनंदन करें और गर्मियों का स्वागत करें, आखिर जीवन भी तो एक तरह का ऋतु-चक्र है... सुख-दुख, धूप-छाँह, सर्दी-गर्मी का... गुड़ीपड़वा पर आनंद-वर्षा हो... बस यही है शुभकामना...

16/03/2012

जीवन का रहस्य.... रंग


होली गुजरे चार दिन हो चुके हैं, लेकिन मालवा-निमाड़वासियों का जैसे मन ही नहीं भरता होली के गुलाल-अबीर से, तभी तो चौथे दिन रंगपंचमी मनाते हैं और गुलाबी-हरा-नीला-काला-सुनहरी रंग पोते हुए रंग-बिरंगी होकर पूरी दुनिया को रंगीन करने निकल पड़ते हैं।
जहाँ होली को पूरी शालीनता और सभ्यता से सूखे रंगों के साथ मनाते हैं, वहीं रंगपंचमी पर जैसे साल भर की मस्ती का कैथार्सिस होता है। कोई भी रंग चलेगा... रंगने के लिए भी कोई भी चलेगा और लगाने के लिए भी। मस्ती का आलम यूँ होता है कि बाजार-सड़क तक रंगीन हो जाया करती है। इसी दिन गेर निकालने की परंपरा है... परंपरा क्या है सामूहिक मस्ती का आयोजन है। खूब रंग-गुलाल साथ लिए... बड़ी-बड़ी मिसाइलों से सबपर उड़ाते पूरे माहौल को रंगमय करते चलता बड़ा-सा हुजूम... और इसमें शामिल होते जाते और... और.... और.....।
अपने बचपन में गेर में बनेठी घुमाते बच्चों और युवाओं को देखा करते थे, अब इसका स्वरूप सिर्फ जुलूस की तरह हो चला है। या फिर जैसे रंगों की बारात... हर तरफ रंग, मस्ती, बेखयाली, तरंग, नशा... बस। बेतरतीब रंगों से रंगोली की रचना होती है, और गुजरने के बाद सड़कें उस अनगढ़ रंगोली से जैसे मौसम की मस्ती-मिजाजी का भी पता देती है.... जिस जगह से ये गेर या अब इसे फाग यात्रा नाम दे दिया गया है गुजरती है ऐसा लगता है जैसे पूरी कायनात को रंगने निकली हो...। शामिल होने वाला मस्त देखने वाला भी मस्त... बस ऐसा लगने लगता है कि ये मस्ती ही स्थायी हो जाए, क्योंकि यही तो रहस्य है, सार है... जीने का, जीवन का....।