31/07/2013

पत्तों के आँसू


सावन लगा तो नहीं था, लेकिन बारिश लगातार हो रही थी। मौसम की मेहरबानी और बेहद अस्त-व्यस्तता भरे ‘लंबे’ हफ्ते के बाद शांत और क्लांत मन... पूरी तरह से सन्डे का सामान था...। ऐसे ही मौकों पर हम अपने आस-पास को नज़र भरकर देख पाते हैं, जी पाते हैं। घर भर पर नज़र मारते हुए ऐसे ही छत के गमलों पर नज़र गई थी। वो बड़े-बड़े पत्तों वाला पौधा एकदम खिल और हरिया गया था। मौसम ने भी तो बड़ी दरियादिली दिखाई है ना...
‘ये इनडोर प्लांट है ना...?’
‘हाँ’
‘तो इसे तो ड्रांईंग रूम में होना चाहिए...’
‘वहाँ, ले चलते हैं।’
वो पौधा ड्रांईंग रूम के कोने में आ पहुँचा था। मन उसे देख-देखकर मुग्ध हो रहा था। हफ्ते के व्यस्तता भरे दिनों में भी आते-जाते उस कोने को देखना खुश कर दिया करता था। सप्ताह की शुरुआत के दो दिन तो ऐसा मौका ही नहीं मिल पाया कि उसके करीब बैठा जा सके। इस बीच एक दिन जरूर उस पौधे के पास की जमीन बड़ी गीली-गीली-सी लगी। नज़र उठाकर छत को देख लिया, कहीं ऐसा तो नहीं छत से पानी टपक रहा हो, आखिर तो महीने भर से लगातार हो रही बारिश को कोई भी सीमेंट कब तक सहन करेगी, लेकिन छत भी सूखी ही थी, फिर लगा कि शायद पास की खिड़की खुली रह गई हो, बौछारें भीतर आ गई हो...। अमूमन काम के दिनों में दिमाग इतने झंझटों में फँसा हुआ करता है कि घर की छोटी-मोटी चीजों पर ध्यान ही नहीं जाता है। उसी शाम बाहर की तेज़ बारिश के बीच घर पहुँची तो सरप्राइसिंगली गर्मागर्म कॉफी का मग इंतजार कर रहा था। अपने कॉलेज के दिनों में कहीं पढ़-सुन लिया था कि कॉफी पीने से दिमाग का ग्रे-मैटर कम हो जाता है और वो काम करना कम कर देता है। यूँ ही दिल हावी हुआ करता है, इसलिए कॉफी से दूरी बना ली थी, पसंद होने के बावजूद...। इसलिए जब बिना अपेक्षा के आपकी पसंद की कोई चीज़ मिल जाए तो इससे बड़ा सरप्राइज और क्या होगा...? खैर तो कॉफी का कप था, विविध भारती पर पुरानी गज़लों का कोई प्रोग्राम चल रहा था, बिजली गुल थी और बारिश मेहरबान...। कोने के उस पौधे के पास ही आसन जमा लिया था, गज़ल के बोल और बारिश की ताल... कुल मिलाकर अद्भुत समां था। अचानक बाँह पर पानी की बूँद आ गिरी थी। फिर से छत को देखा था... आखिर ये पानी आया कहाँ से? खिड़की की तरफ भी नज़र गई थी, उसके भी शीशे बंद थे। फिर सोचा वहम होगा... लेकिन थोड़ी देर बाद फिर वही...। इस बार कोने वाले पौधे को गौर से देखा... उसके सबसे नीचे वाले पत्ते पर पानी जमा था... और तीन-चार पत्तों के नोंक पर पानी की बूँद टपकने की तैयारी में थी... अरे... ये क्या? ये पौधा पानी छोड़ रहा है। जब इसे छत से ला रहे थे तो गमले में भरे पानी को भी निकाल दिया था, लेकिन हो सकता है कि मिट्टी में अब भी इतनी नमी हो कि अतिरिक्त पानी तने से गुज़रकर पत्तों की नोंक से डिस्चार्ज हो रहा हो...। इंटरनेट पर देखा तो इस पौधे को आमतौर पर एलिफेंट इयर या फिर Colocasia esculenta के नाम से जाना जाता है।
कितना अद्भुत है ना प्रकृति का सिस्टम... अतिरिक्त कुछ भी अपने पास नहीं रखती हैं, जो कुछ भी उसके पास अतिरिक्त होता है, वो उसे ड्रेन कर देती है, डिस्चार्ज कर देती है। बारिश के पानी से भरा हुआ लॉन सामने पसरा नज़र आया...। समझ आया कि प्रकृति का सारा संग्रहण हमारे लिए है... कुछ भी वो अपने लिए नहीं रखती है और फिर भी उसके संग्रहण की एक सीमा है? जाने विज्ञान का सच क्या है? लेकिन प्रकृति उतना ही ग्रहण करती है, जितने कि उसको जरूरत है... जितना वो संभाल पाती है। इतना ही नहीं, इंसान को छोड़कर बाकी जीव-जंतु भी... बल्कि तो इंसान के शरीर का भी सच इतना ही है... पेट भरने से ज्यादा इंसान खा नहीं सकता है... बस मन ही है जो नहीं भरता... किसी भी हाल में नहीं भरता है, ये होता है तो कुछ और चाहने लगता है, कुछ ओर हो जाता है तो और कुछ चाहने लगता है... और खत्म होने तक यही चाहत बनी रहती है। और चाहतों का बोझ लिए ही इंसान इस दुनिया से विदा हो जाता है... मरते हुए भी बोझ से छुटकारा नहीं होता... तो फिर सवाल उठता है कि क्या हम कुछ सीखेंगे प्रकृति से....!


11/06/2013

'बड़े' होने का दर्शन बनाम मनोविज्ञान बनाम हवस...


वो दोनों बस इससे पहले एक ही बार मिले थे। और उस वक्त दोनों ने ही एक-दूसरे को ज्यादा तवज्ज़ो नहीं दी थी। इस बार भी दोनों मिले तो लेकिन गर्माहट-सी नहीं थी। शायद दोनों को पिछली मुलाक़ात याद भी नहीं आई। वो दुराव भी याद नहीं था। इस बार मिले तब भी दोनों ही तरफ हल्की-हल्की झेंप थी... नए को लेकर संकोच था। लेकिन हमउम्र थे, इसलिए ये संकोच, झेंप और ठंडापन ज्यादा देऱ ठहर नहीं पाया और दोस्ती हो गई। बचपन किसी भी ‘कल’ को लाद कर नहीं चलता है, उसके लिए हर दिन पहला दिन होता है, शायद इसीलिए वो बेफिक्र होता है...। बड़ों की बातचीत से दोनों ने एक तथ्य जाना कि कनु उम्र में नॉडी से बड़ा है। नॉडी ने उस तथ्य को हवा में उड़ा दिया... क्योंकि उसे ‘छोटा’ होना मंज़ूर नहीं था और कनु ने उसे तुरंत लपक लिया, क्योंकि उसे बहुत दिनों बाद ‘बड़ा’ होने का मौका हासिल हुआ। थोड़ी देर झेंप के खेल के बाद दोनों ने एक-दूसरे से दोस्ती कर ली और साथ खेलने लगे। अब दो हमउम्र बच्चे साथ खेलेंगे तो झगड़ेंगे भी... तो थोड़ी ही देर बाद दोनों के बीच झगड़ा भी हो गया... वज़ह थी बड़ा होना...। कनु ने तो अपनी पसंद का सच लपक लिया था कि वो बड़ा है, लेकिन नॉडी उस सच से बचना चाह रहा था, क्योंकि वो भी बड़ा होना चाह रहा था। खैर... बच्चों के झगड़े क्या? अभी झगड़े और बिना किसी प्रयास के दोस्ती भी हो गई... क्योंकि वही... उनके ज़हन में कोई ‘कल’ नहीं ठहरता है।
दोनों के झगड़े की वजह सुनकर सारे ‘बड़े’ हँसे... हँसने की बात ही थी, अब ये कोई बात है कि कौन बड़ा है, इसे लेकर झगड़ा हो... अब भई जो बड़ा है वो बड़ा है और जो छोटा है, वो छोटा है... लेकिन क्या सचमुच हँसने की ही बात थी? सोचने की नहीं... कि क्यों बच्चा, ‘बड़े’ होने का अर्थ जाने बिना ‘बड़ा’ हो जाना चाहता है! जबकि जो बड़े हो गए हैं, वो अपना बचपन याद करते हुए आँहे भरते हैं कि वो दिन भी क्या दिन थे...? कम-अस-कम ये ऐसा तो कतई नहीं है कि जो गुज़र गया है, वो ही खूबसूरत है। फिर क्या वाकई हम बड़े हक़ीक़त में छोटे होना चाहते हैं, जबकि सारी लड़ाई तो हर स्तर पर ‘बड़े’ हो जाने की है। बच्चा बड़ा होना चाहता है, क्योंकि उसे लगता है कि बड़े होने में सत्ता है, जीत है, अधिकार, स्वतंत्रता है। हर ‘छोटा’ बड़ा हो जाना चाहता है, हर लघु विराट् हो जाना चाहता है... और सारा जीवन उसी जद्दोज़हद का हिस्सा बन जाता है। ये बच्चों का भी सच है और बड़ों का भी... बच्चों का सच तो वक्ती है, लेकिन बड़ों का सार्वकालिक, सार्वत्रिक, सार्वभौमिक है।
हम उम्र के तथ्य को जानते हैं तो ओहदे में, प्रभाव में, बल में, अर्थ में, बुद्धि में..., बड़े होना चाहते हैं, और यदि नहीं हो पाते हैं तो किसी ‘बड़े’ के बड़प्पन के छाते के नीचे आ जाना चाहते हैं, क्योंकि जो मनोविज्ञान बच्चे लघु रूप में समझते हैं, हम उसके विराट् रूप को समझ चुके होते हैं। हम प्रभावित करना चाहते हैं, अधिकार चाहते हैं, सत्ता और शासन चाहते हैं और इन्हीं चीजों के लिए हम ‘बड़े’ होना चाहते हैं, ऐसे नहीं तो वैसे... किसी भी तरह से। शायद सारा स्थूल विश्व ‘बड़े’ हो जाने की..., ‘विराट्’ हो जाने की ख़्वाहिश से संचालित होता है। इसी से प्रकृति में गति है, इसी में विकार भी। सिर्फ इंसान ही क्यों प्रकृति भी तो लघु से विराट का रूप ग्रहण करती है। एक पतली-सी धारा नदी में और नदी समुद्र में परिवर्तित होती है, बीज, पौधे में और पौधा पेड़ में बदलता है। कली, फूल में और फूल फल में बदलता है। वीर्य, भ्रूण में और भ्रूण शिशु में बदलता है। बच्चा, किशोर होकर वयस्क और फिर जवान होता है। गोयाकि ‘बड़ा’ हो जाना मात्र ख़्वाहिश ही नहीं, लक्ष्य भी है। या फिर बड़ा होना नियति... क्योंकि ‘विराट्’ विकार भी है और विनाश भी... ।

03/06/2013

जान की कीमत...


बॉक्स की न्यूज थी... हमेशा की तरह फ़र्ज अदायगी को महिमामंडित किया गया था। वीसी शुक्ल के युवा पीएसओ ने ये कहकर आखिरी गोली खुद को मार ली कि बस हम अब आपकी रक्षा नहीं कर सकते हैं। टीवी और अख़बार लगे हुए हैं, उसके आखिरी शब्दों की जुगाली में। ख़बर तो जाहिर है बहुत बड़ी थी, इतनी बड़ी संख्या में इस देश में राजनीतिक लोगों की मौत कभी हुई ही नहीं... पूरा इतिहास खंगाल लें। तब भी नहीं जब श्रीपेरंबदुर में राजीव गाँधी की आत्मघाती हमले में मौत हुई थी। जबकि वे वहाँ चुनावी रैली को संबोधित करने गए थे और जाहिर है कि उनके साथ वहाँ स्थानीय राजनीतिज्ञों की फ़ौज होगी... लेकिन तब भी इतने राजनीतिज्ञ हताहत नहीं हुए थे, जितने कि सुकमा में हाल ही में हुए नक्सली हमलों में हुए। छत्तीसगढ़ की राजनीति के बारे में बहुत जानकारी नहीं है, अरे... राजनीति के बारे में ही जानकारी कम है, जबकि इसके बारे में ही सबसे ज्यादा जानकारी होनी चाहिए थी, अब पढ़ा तो यही है ना! कुछ समय पहले अपने प्रोफेसरों से मिलने का 'संयोग' हुआ, अरे सौभाग्य-वौभाग्य कोई बात नहीं है और दुर्भाग्य तो खैर है ही नही... हाँ तो उनसे मिलने के दौरान बहुत सालों बाद बल्कि यूनिवर्सिटी छोड़ने के बाद याद आया कि पॉलिटिकल-साइंस पढ़ा है। शायद राजनीति ने जल्दी ही इससे मोहभंग कर दिया। नहीं पॉलिटिकल-साइंस से नहीं... बल्कि पॉलिटिक्स से... पॉलिटिकल-साइंस तो बहुत सारी चीजों की तरह ही दुखती रग है। खैर तो कहा तो ये जा रहा है कि हालिया नक्सली हमले ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के फ्रंट लाइन नेताओं की बलि ले ली। होगा ही, क्योंकि इस हमले में कांग्रेस के बहुत सारे कद्दावर नेताओं की जान ले ली और इसमें कुछ ऐसे लोगों की भी मौत हुई जो बेनाम है, अनजान और नामामूल किस्म के हैं। ड्रायवर, सहयोगी, सुरक्षा कर्मी आदि-आदि... महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और इसी तरह के बड़े-बड़े नामों के बीच ये गुमनाम लोग। राजनीतिज्ञ तो सारे-के-सारे चुनाव की तैयारियों के लिए वहाँ गए थे, चुनाव जीतते तो कुछ-न-कुछ तो मिलता ही, लेकिन उनके साथ जो लोग मारे गए उनका क्या? उन्हें क्या मिला? क्या मिलता?
ये सवाल बड़ा असुविधाजनक है, कह तो सकते हैं कि बड़ा अहमकाना भी। अरे यही व्यवस्था है, ऐसा ही होता आया है। अरस्तू ने भी तो कहा है कि महत्वपूर्ण काम करने वालों को सहयोगियों (उन्होंने तो खैर बाकायदा गु़लाम कहा था, लेकिन जरा सभ्य हो गए हैं, इसलिए शब्द थोड़े सॉफ्ट कर दिए हैं।) की जरूरत होती ही है। आखिर तो जो वीआईपी होते हैं, वे देश की संपदा होते हैं, व्यवस्था की रीढ़... उनका वज़ूद कितना अहम है वो इस बात से तय होता है कि उनके जीवन के लिए कितने लोग अपना जीवन कुर्बान कर सकते हैं? आखिर आम लोगों की जिंदगी का मतलब ही क्या है? लेकिन ये कौन तय करता है कि किसकी जिंदगी कितनी महत्वपूर्ण हैं और ये अधिकार किसने दिया है, किसको दिया है और किस नाते दिया गया है? पात नहीं ‘जीवन’ के प्रति संवेदना बढ़ गई है, इसलिए या फिर ‘इंसानी जीवन’ के प्रति व्यवस्थागत असंवेदनशीलता कम हुई है, इसीलिए ये सवाल परेशान कर रहा है कि कैसे और क्यों किसी की जान की कीमत कम और किसी की ज्यादा हो जाती है? और ये कीमत कौन तय करता है और उसका आधार क्या होता है? इसलिए कुछ बेवजह के सवाल आकर घेरते रहते हैं... व्यवस्था की क्रूरता की वजह से, आक्रोश पैदा होता है और इसलिए लगता है कि व्यवस्थाएं, अपने लिए सिर्फ ‘बोनसाई’ चाहती हैं... मनुष्यों को अपने हिसाब से कांट-छांट कर बनाने से ही व्यवस्थाएं सर्वाइव करती हैं और हम इतने कंडिशंड हो चुके हैं कि हमें इसमें कुछ भी नया, कुछ भी गलत नहीं लगता है...?
आखिर क्यों किसी के लिए अपनी जान की कुर्बानी दें...? जिसके लिए कुर्बानी दी जा रही है, वो इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं कि कइयों की जान उस पर न्यौछावर कर दी जानी चाहिए...! तो क्या ऐसा है कि किसी जिंदगी का मूल्य महज पैसा है? सिर्फ पैसा ही वो वजह होती है, जिसकी वजह से कोई अपनी जान का सौदा करता है और सिर्फ पैसा ही वो वजह है, जिसकी वजह से किसी की जान बहुत सारे लोगों की जान से ज्यादा कीमती हो जाती है। तो फिर मानवता, इंसानियत, लोकतंत्र, समानता और भाईचारा सिर्फ शब्द नहीं रह जाते हैं, खोखले, अर्थहीन और बे-ग़ैरत शब्द। सिर्फ धन वो शब्द नहीं हो जाता है, जिसका अर्थ है! और फिर हमारी सारी संवेदना, ज्ञान, दर्शन, विचार, व्यवस्था, समाज सब कुछ बेमानी नहीं हो जाता है, जब अर्थ ही एकमात्र संचालक नजर आता हो तो... !



01/05/2013

मई दिवस, मार्क्स और बचपन

कोई-कोई बचपना भी अजीब होता है... बहुत, बहुत अजीब। ये न बचपना कहलाता है और न ही परिपक्वता... जाने इसे किस कैटेगरी में रखेंगे... मई दिवस के मौके पर ये बचपना लगातार ज़हन पर दस्तक दे रहा है। इसे तब बचपना कहा जा सकता था, लेकिन आज क्या कहा जाए, ये सवाल भी परेशान कर रहा है।
जाने ये चेतना कब आई, लेकिन जब भी आई तब से मई दिवस एक खास दिन की तरह... किसी त्योहार की तरह लगता रहा है। बचपन के उन दिनों में इस दिन कुछ नया और खुशनुमा फील होता रहा... अब भी होता है... जैसे कुछ बहुत-बहुत अपना हो, निजी... बेहद पर्सनल। तब जाने कैसे समझ ने मई दिवस का संबंध मार्क्स के जन्मदिन से जोड़ लिया था। मार्क्स... जब नहीं जानती थी, तब ईश्वर-तुल्य हो गए थे... क्यों, न तब समझी, न अब...। शायद बचपना इसी को कहते होंगे। पूँजीवादी परिवेश और ‘प्रवत्ति’ (या फिर उपभोगवादी प्रवृत्ति ज्यादा सटीक होगा, लेकिन प्रकारांतर से बात तो वही होगी ना!)... पूरी तरह से नहीं, लेकिन हाँ, इससे खुद को अलग दिखा पाऊँ, ऐसा नैतिक साहस नहीं पाती, तब भी मार्क्स, जाने कैसे हीरो हो गए थे...। तब तो ये भी नहीं जाना था कि आखिर ये हैं कौन और मार्क्सवाद बला क्या है? अब सोचती हूँ तो कोई ऐसा टर्निंग पाईंट नहीं पाती, जहाँ से इस इंसान से पहला परिचय हुआ हो... बस, याद आता है तो इतना कि जिस उम्र में लड़कियों को जवान और खूबसूरत लड़कों के प्रति फेसिनेशन हुआ करता था, उस उम्र में मुझे मार्क्स और मार्क्सवाद फेसिनेट करने लगा था। और सच पूछें तो आज भी उस आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाई... अब भी व्यवस्था पर चलती बहस को अक्सर मार्क्सवाद की रिलेवेंसी पर कनक्लूड करती हूँ। यूँ मई दिवस या मजदूर दिवस का मार्क्स से कोई सीधा संबंध नहीं है, सूचना में सही है, लेकिन चेतना में तो वही है... मई दिवस मतलब मार्क्स का आह्वान... फिर वही बचपना...।
फिर लेनिन, चे, कास्त्रो और ह्युगो रियल हीरोज की लिस्ट में शामिल होने लगे और इंस्पायरिंग हीरो के तौर पर निकोलाई बुखारिन, ट्रॉटस्की, अंटोनियो ग्राम्शी, जॉर्ज लुकास और पूँजीवाद और अमेरिका विरोध करते हुए नॉम चोमस्की भी लिस्ट में आ गए। हर वो अंतर्राष्ट्रीय घटना, जिससे मार्क्सवाद का क्षरण हुआ, उसने निराश किया और हर वो घटना जिससे उस बुझती आग में चिंगारी भड़की उसने मुझे उत्साह से भर दिया। सोवियत संघ का पतन, पूर्वी यूरोप में मार्क्सवाद का खत्म होना और आखिर में इतिहास के अंत ही घोषणाओं और हाल ही में ह्युगो की मौत ने बुझा दिया और कास्त्रो का संघर्ष, लेटिन अमेरिका में ह्युगो शॉवेज का उदय... इटली, फ्रांस और जर्मनी के चुनावों में वामपंथियों की विजय के समाचार उत्साहित करते रहे। आज भी जबकि मार्क्सवाद सिर्फ विचारों में ही बचा है, जाने कैसे इसके हकीकत में ‘जिंदा’ होने की उम्मीद जिंदा है... भीतर। एक और बचपना...। लगता है इस बचपने से बुढ़ापे तक निज़ात नहीं है। मजदूर और मजदूरों से यूँ कभी कोई वास्ता नहीं रहा, लेकिन मार्क्स ने अपने विचारों से कोई सूत्र तो जोड़ा ही है... कुछ बातें जीवन भर रहती है, ज़हन में वैसी ही, जैसे बचपन में थी, उसी रंग-रूप-आकार में... कुछ को हम वैसे ही सहेजना भी चाहते हैं... बस इस बात के साथ कुछ ऐसा ही है। अब आप चाहे तो इसे भी कह सकते हैं … बचपना...